सांसद राहुल कस्वां ने संसद में उठाया मुद्दा, केंद्र सरकार से की विशेष हरित कार्ययोजना की मांग
चूरू लोकसभा क्षेत्र के सांसद राहुल कस्वां ने संसद में चूरू जिले के लगातार घटते वन क्षेत्र का गंभीर मुद्दा उठाया है। लोकसभा में उनके प्रश्न (Unstarred Question No. 1313) के जवाब में केंद्र सरकार ने स्वीकार किया है कि चूरू का वन क्षेत्र मात्र 0.45 प्रतिशत (62.73 वर्ग किलोमीटर) रह गया है
चूरू। मरुस्थलीकरण, भीषण गर्मी और लगातार गिरते भूजल स्तर से जूझ रहे चूरू जिले के पर्यावरण को लेकर सांसद राहुल कस्वां ने लोकसभा में गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनके द्वारा पूछे गए एक सवाल के लिखित जवाब में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने जो आंकड़े पेश किए हैं, वे जिले के भविष्य के लिए एक बड़ी चेतावनी हैं।
संसद में पेश किए गए चौंकाने वाले आंकड़े
लोकसभा में पर्यावरण राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह द्वारा दिए गए जवाब के अनुसार:
- अत्यंत कम वन क्षेत्र: इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (ISFR) 2023 के अनुसार, चूरू जिले का वन क्षेत्र घटकर मात्र 62.73 वर्ग किलोमीटर रह गया है। यह जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्र का सिर्फ 0.45% है।
- राष्ट्रीय औसत से भारी अंतर: इसकी तुलना में देश का औसत वन क्षेत्र 21.76% है, जबकि पूरे राजस्थान राज्य का औसत वन क्षेत्र 4.84% है।
नगर वन योजना की स्थिति: केंद्र सरकार ने बताया कि 'नगर वन योजना' के तहत राजस्थान में 1,855.18 हेक्टेयर को कवर करने वाली 55 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। हालांकि, इनमें से चूरू जिले के हिस्से में 140 हेक्टेयर को कवर करने वाली केवल 3 नगर वन परियोजनाएं ही स्वीकृत हुई हैं।
सरकार ने अपने जवाब में यह भी बताया कि चूरू एक अर्ध-शुष्क क्षेत्र में आता है जहाँ बारिश कम होती है, इसलिए वहां स्थानीय और सूखा-सहिष्णु (drought-tolerant) प्रजातियों के पौधे लगाए जा रहे हैं। इसके अलावा, ताल छापर वन्यजीव अभयारण्य के पारिस्थितिकी तंत्र (grassland ecosystem) की सुरक्षा के लिए इको-सेंसिटिव जोन (Eco-Sensitive Zone) अधिसूचित किया गया है।
सांसद राहुल कस्वां की प्रमुख मांगें
सरकारी योजनाओं और जवाबों पर असंतोष जाहिर करते हुए सांसद कस्वां ने कहा कि तमाम परियोजनाओं और करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी यदि वन क्षेत्र 0.45 प्रतिशत पर अटका है, तो इसका अर्थ है कि सामान्य योजनाएं चूरू के लिए काम नहीं कर रही हैं।
उन्होंने सरकार से चूरू के लिए एक जिला-विशिष्ट और वैज्ञानिक कार्ययोजना की मांग की है, जिसमें निम्नलिखित बिंदु शामिल हों:
- 10 वर्षीय लक्ष्य: अगले 10 वर्षों के लिए वन क्षेत्र में वृद्धि का एक स्पष्ट और पारदर्शी लक्ष्य निर्धारित किया जाए।
- व्यापक पौधारोपण: ग्राम पंचायत, गोचर और सार्वजनिक भूमि पर बड़े पैमाने पर सूखा-सहिष्णु देशी प्रजातियों का वैज्ञानिक तरीके से रोपण हो।
- निगरानी और मूल्यांकन: केवल पौधे लगाना पर्याप्त नहीं है। पौधों की उत्तरजीविता (Survival Rate) का नियमित मूल्यांकन और थर्ड-पार्टी मॉनिटरिंग (Third-party monitoring) अनिवार्य की जाए।
- जनभागीदारी: इन परियोजनाओं में स्थानीय लोगों और सामाजिक संस्थाओं की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित की जाए।
सांसद राहुल कस्वां ने स्पष्ट किया कि चूरू को अब केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि ठोस परिणामों की आवश्यकता है। हरित चूरू का सपना केवल पर्यावरण बचाने के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जल, जीवन और आजीविका को सुरक्षित करने के लिए भी एक जरूरी कदम है।
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