जगदीप धनखड़ पर बंटा समाज: बोलने पर आलोचना, चुप रहने पर भी सवाल — क्या जाट समाज अपने प्रतिनिधियों को समझने में चूक रहा है?
अन्य समुदाय अपने नेताओं की कमियों को ढककर, उनकी उपलब्धियों को सामने रखते हैं, जिससे उनका प्रतिनिधित्व राजनीतिक तौर पर मजबूत होता है। इसके विपरीत, जाट समाज अपनी ही बिरादरी के नेताओं को उनके राजनीतिक निर्णयों के आधार पर ‘गद्दार’ या ‘बेकार’ ठहरा देता है, जिससे सामूहिक शक्ति कमजोर होती है। अब समय आ गया है कि जाट समाज नेतृत्व के प्रति केवल आलोचना नहीं, बल्कि सहयोग, धैर्य और दीर्घदृष्टि अपनाए। समाज को हर विचारधारा और दल में अपने प्रतिनिधियों को तैयार करना, उन्हें समर्थन देना और उनके निर्णयों के दूरगामी परिणामों का इंतजार करना सीखना होगा। तभी समाज फिर से राजनीति के केंद्र में स्थान पा सकता है।
समाज तब तक मज़बूत नहीं हो सकता जब तक वह अपने लोगों की विफलताओं को उजागर करने में तो तेज़ी दिखाए लेकिन उनके संघर्षों और उपलब्धियों को स्वीकारने में कंजूसी करे।
जाट समाज, जो सदियों से स्वाभिमान, संघर्ष और नेतृत्व के लिए जाना गया है, उसे अब यह आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या हम केवल आलोचना के लिए आलोचना कर रहे हैं? क्या हम वही गलती बार-बार दोहरा रहे हैं – 'जाट ही जाट को मारे'?
किसी व्यक्ति के विचार, निर्णय या राजनीतिक रास्ता भले ही अलग हो सकता है, लेकिन अगर वह समाज से आता है, समाज के लिए काम करता है, तो उसकी भूमिका को नजरअंदाज करना केवल अपनी राजनीतिक अपरिपक्वता को दर्शाता है।
क्या कोई समाज अपने ही प्रतिनिधियों पर लगातार अविश्वास जताकर आगे बढ़ सकता है?
यह बात केवल व्यक्तिगत समर्थन की नहीं है, यह उस आत्मघाती प्रवृत्ति की पहचान है जिसमें समाज अपने लोगों को उनके संघर्षों के दौरान नहीं, बल्कि उनके जाने के बाद पहचानता है।
जब दूसरे समुदाय अपने लोगों को आगे बढ़ाने के लिए मिलकर प्रयास करते हैं, तब जाट समाज अपनी ही बिरादरी के व्यक्तित्व को “काम का नहीं” करार देने में लगे रहते हैं। यही वह कारण है कि जाट राजनीति धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही है।
ऐसे में समाज को यह समझना होगा कि निर्णय लेने वाले व्यक्ति ने वह निर्णय सोच-समझ कर ही लिया होगा। जब कोई नेतृत्वकारी भूमिका में होता है, तो उसके हर निर्णय के नतीजे तुरंत नहीं दिखते।
कई बार समय ही उस निर्णय की परिपक्वता साबित करता है। अतः धैर्य रखना और इंतजार करना बेहतर विकल्प है कि परिणाम किस दिशा में जाता है। यदि कोई हर बार आलोचना करने को ही अपनी भूमिका मान ले और सहयोग की भावना छोड़ दें, तो नेतृत्व उभर नहीं सकता।
अब जगदीप धनखड़ पर उठे सवालों की तह में चलते हैं...
हाल ही में एक प्रवृत्ति देखी गई है जिसमें कुछ लोग यह नैरेटिव चला रहे हैं कि उपराष्ट्रपति पद पर रहते हुए जगदीप धनखड़ ने न तो जाट समाज के लिए कुछ किया, न किसानों के लिए। लेकिन यह सिर्फ अधूरी जानकारी और राजनीतिक पूर्वाग्रह का नतीजा है। आइए तथ्यों से परखें—
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उपराष्ट्रपति रहते हुए वे किसानों के मुद्दों पर सीधे संसद में आवाज़ नहीं उठा सकते थे, क्योंकि उनकी भूमिका 'सभापति' की होती है, जहाँ निष्पक्षता सर्वोपरि होती है। लेकिन फिर भी किसानों से किए वादों को पूरा करने को लेकर अपनी ही सरकार में मंत्री शिवराज सिंह चौहान को चेताते हुए तथा मुखर रूप से अपनी बात रखते हुए धनखड़ नजर आए थे। वहीं बंगाल के राज्यपाल रहते हुए धनखड़ ने जिस तरह से ममता बनर्जी के दमन के खिलाफ आवाज़ उठाई, वह किसी से छिपा नहीं है।
उन्होंने न केवल शोषित वर्गों की बात उठाई, बल्कि कई बार तो खुद सड़कों पर जाकर लोगों से संवाद किया, जब किसी को भी बंगाल में कदम रखने की इजाजत नहीं थी। -
बहुत कम लोगों को पता है कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35A को हटाने वाले विधेयक के कानूनी मसौदे के पीछे धनखड़ का महत्वपूर्ण योगदान था। ऐसे समय में जब संवैधानिक साहस की जरूरत थी, धनखड़ उस भूमिका में खड़े थे।
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उन्होंने कॉलेजियम प्रणाली की तानाशाही पर सीधा सवाल उठाया। जब सुप्रीम कोर्ट की बेंच राष्ट्रपति को अप्रत्यक्ष रूप से चुनौती दे रही थी, तब उपराष्ट्रपति धनखड़ ने न केवल उसका प्रतिकार किया, बल्कि केंद्र सरकार की गरिमा भी बचाई।
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बांग्लादेशी घुसपैठ, रोहिंग्या समस्या, इन संवेदनशील मुद्दों पर भी उन्होंने संसद के मंच से या विभिन्न साक्षात्कारों में बार-बार कहा कि भारत के संसाधनों को केवल भारतीय नागरिकों को मिलना चाहिए।
ऐसे में सवाल उठता है – क्या यही वह व्यक्ति नहीं है, जिसकी देशभक्ति, संवैधानिक निष्ठा और समाज के प्रति प्रतिबद्धता पर गर्व होना चाहिए?
क्या उस व्यक्ति को केवल इसलिए खारिज कर दिया जाए कि किसी को लगा कि वह "अपने समाज" के लिए पर्याप्त नहीं बोल सका?
समाज को यह तय करना है कि वह अपने भविष्य के नेतृत्व को प्रोत्साहित करेगा या केवल आलोचना में ही मशगुल रहेगा। जगदीप धनखड़ जैसे व्यक्ति पर संदेह करना, उनकी आलोचना करना तब जब उन्हें पद से हटाया गया है या उन्होंने पद त्याग किया है, न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि समाज के राजनीतिक आत्मसम्मान की विफलता को दर्शाता है।
वहीं एक बात और — जो लोग आज समाज के ठेकेदार बनकर ऊँगली उठा रहे हैं कि फलां व्यक्ति ने जाट समाज के लिए ये नहीं किया, वो नहीं बोला — उन्हें खुद से ये सवाल ज़रूर करना चाहिए:
“क्या आपने ही उन्हें उप-राष्ट्रपति बनाया था?”
“क्या आपने उस समय उतना ही समर्पण, एकता और समर्थन दिखाया था जितना आज आप आलोचना में दिखा रहे हैं?”
आलोचना से पहले आत्ममंथन ज़रूरी है। सिर्फ़ दूसरों को कटघरे में खड़ा करना आसान है, पर क्या हम खुद भी उस भूमिका में कभी खड़े थे जहां से हम आज दूसरों को जज कर रहे हैं?
समाज को तय करना होगा कि वह हर बार अपने ही लोगों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित करता रहेगा, या फिर वक्त आने पर उनके साथ संवेदनशील समर्थन की भूमिका निभाएगा।
एक नई सोच की आवश्यकता
आज समय की माँग है कि समाज अपने नेतृत्व को समझे, साथ दे, और समय आने पर उनका सही मूल्यांकन करे। नेतृत्व को केवल चुनाव जीतने या हारने से नहीं, बल्कि उनके द्वारा खड़े किए गए विचारों, लड़ाइयों और उनके दीर्घकालिक परिणामों से आँका जाना चाहिए।
यह समझना जरूरी है कि समाज का एकजुट समर्थन ही किसी नेता को ताकत देता है, और उसी समर्थन की कमी किसी भी अच्छे नेता को अकेला कर सकती है।
अगर समाज ने अपना सोचने का हिसाब नहीं बदला, तो वो कहावत — "जाट को मारे जाट" — केवल कहावत नहीं रहेगी, एक भविष्यवाणी बन जाएगी और यह प्रक्रिया बहुत घातक परिणाम देने वाली होगी।
वहीं “झुका हुआ जाटऔर टूटी खाट किसी काम की नहीं”— इस कहावत को हम सभी ने सुना है, और शायद अनजाने में अपने अवचेतन में बैठा भी लिया है। लेकिन अगर इस सोच को सच मान लें, तो इसका अर्थ यही निकलेगा कि जो जाट आपके विचार से मेल नहीं खाता, वह जाट कहलाने का हकदार नहीं है। सवाल ये है—क्या किसी व्यक्ति की उपयोगिता केवल तब तक है जब तक वह हमारी अपेक्षाओं पर खरा उतरता है?
धनखड़ की भूमिका पर सवाल — कितना न्यायसंगत?
सोशल मीडिया पर कुछ धड़े यह तर्क दे रहे हैं कि जब देश में किसान आंदोलन हो रहा था, जब पहलवान बेटियाँ न्याय की मांग कर रही थीं, या जब जाट समुदाय को राजनीतिक रूप से दिक्कतें थीं—तब उपराष्ट्रपति धनखड़ चुप थे। लेकिन क्या संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह हर मामले में खुलकर बोलें? क्या उनकी चुप्पी एक संवैधानिक मर्यादा का हिस्सा नहीं थी?
जाट आरक्षण में भूमिका: एक ऐतिहासिक योगदान
2010 में जब राजस्थान में जाट समुदाय को ओबीसी आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन तेज़ हुआ, तब धनखड़ न केवल राजनीतिक मंच पर, बल्कि न्यायिक गलियारों में भी संघर्ष करते दिखे। वे सुप्रीम कोर्ट तक इस मामले को ले गए और केंद्र सरकार को जाटों को आरक्षण देने की सिफारिश करनी पड़ी। यह किसी भी राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी, जिसे नकारना तथ्यों से आँखें मूँदने जैसा है।
क्या हम केवल आलोचना में ही सक्षम रह गए हैं?
अगर किसी जाति का समर्थक वर्ग हर बार अपने ही व्यक्ति को नीचे खींचने में लग जाए, तो यह एक राजनीतिक आत्मघात है। अन्य समुदायों की ताकत यह है कि वे अपने लोगों की कमियों पर परदा डाल कर, उनकी अच्छाइयों को मंच पर लाते हैं। इसके विपरीत, जाट समाज में अक्सर यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है कि जब कोई अपना ऊपर पहुँचता है, तो उसे खींचने वाले सबसे पहले उसके ही होते हैं।
समाज को आत्ममंथन की ज़रूरत
कभी-कभी यह भी सोचा जाना चाहिए कि "जो व्यक्ति समाज से अलग सोचता है, वह समाजविरोधी नहीं होता।" अगर हम केवल अपनी सोच को ही अंतिम सत्य मान लें, तो यह न केवल लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ है, बल्कि सामाजिक विकास की राह में भी रोड़ा बनता है।
यदि हर बार हम यही सोचें कि "हमारी बात नहीं मानी गई, तो यह अपना नहीं है," तो हमें अपने सोचने के तरीके की गहराई से समीक्षा करनी होगी। क्यों नहीं हम भी उन समुदायों की तरह अपने व्यक्ति को सभी संस्थानों, राजनीतिक दलो में बने रहने दें, उसका सहयोग करें, उसके निर्णयों पर विश्वास रखें और जहाँ ज़रूरत हो, रचनात्मक आलोचना करें बजाय उसके सार्वजनिक अपमान और उपहास के?
जाट समाज को नया दृष्टिकोण अपनाना होगा
राजनीति में हर समुदाय का प्रतिनिधित्व कई दलों में होता है। फिर जाटों के साथ ऐसा क्यों होता है कि अगर किसी नेता के विचार अलग हैं तो उसे तुरंत "गद्दार" घोषित कर दिया जाता है?
क्यों जाट समाज केवल "अपने विचार का आदमी" न होने की वजह से राह का रोड़ा बन जाता है? यही वो कारण हैं जिनसे जाट राजनीति आज हासिए पर आ गई है। यदि इस समाज को राजनीतिक तौर पर पुनः सशक्त बनाना है, तो उसे धैर्य, दूरदृष्टि और सामूहिक सहयोग की भावना को अपनाना ही होगा। साथ ही इस बात को पचाना भी सीखना होगा कि यदि कोई व्यक्ति हमारे विचारों के विपरीत विचारधारा वाले राजनीतिक दल में शामिल होता है — जैसे कोई कांग्रेस/ भाजपा में या किसी अन्य दल में जाता है — तो हमें उसमें इतनी समझ, सहनशीलता और दूरदृष्टि रखनी होगी कि हम उसकी आलोचना करने या उसके खिलाफ कुण्ठा पालने की बजाय, यह सोचें कि हम उसका यथासंभव सहयोग कैसे कर सकते हैं।
समाज को यह भी स्वीकार करना होगा कि समाज को हर जगह प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है। अगर आपका व्यक्ति किसी भी राजनीतिक दल में बैठा है, तो यह आशा रखी जानी चाहिए कि वह जो भी निर्णय लेगा, वह भविष्य में समाज के लिए बेहतर परिणाम देगा। ऐसे में यदि हमसे कोई सहयोग संभव है, तो हमें वह करना चाहिए।
हमें इस प्रवृत्ति को त्यागना होगा कि जो भी व्यक्ति हमारे विचारों से अलग दिशा में जाए, उसे तुरंत "दगाबाज", "गद्दार", या "संघी/कांग्रेसी" कहकर कलंकित किया जाए। साथ ही समाज को कमज़ोर करने वाली शक्तियों के प्रोपेगैंडा के अंतर्गत 'जाट मरा तब जानियो जब संघी/कांग्रेसी हो जाए' ऐसी बातों का शिकार होने से बचना होगा और परिपक्व, सकारात्मक और समावेशी सोच अपनानी होगी, जिससे समाज में संवाद, सहयोग और समृद्धि बढ़े — टकराव नहीं।
धनखड़ का इस्तीफा एक राजनीतिक घटना है, लेकिन उसकी व्याख्या केवल राजनीतिक चश्मे से करना उचित नहीं होगा। यह समय है कि जाट समाज अपने आत्मविश्लेषण में उतरे, अपनी विचारणात्मक दिशा पर पुनर्विचार करे और आलोचना के बजाय सहयोग की संस्कृति को अपनाए। यदि समाज सच में एक सशक्त जातीय समूह बनना चाहता है, तो अपने 'बड़ों' के निर्णयों पर विश्वास करना और समय के साथ उनके परिणामों की प्रतीक्षा करना सीखना होगा।
धैर्य रखिए, समय के साथ परिणाम आते हैं
जो समाज अपने ही लोगों को शक और तंज की नजर से देखता है, वह कभी एक राजनीतिक शक्ति नहीं बन सकता। जाट समाज की राजनीति हाशिए पर क्यों है?
क्योंकि जाट समाज के लोग नेतृत्व निर्माण की जगह केवल नेतृत्व का उपहास करना सीख गए हैं।
ऐसे में अगर वज़ूद बचाना है तो अब समाज को हर पार्टी, हर विचारधारा में अपने लोग तैयार करने होंगे उनका सहयोग करना होगा, समय देना होगा, समर्थन देना होगा, और परिणाम की प्रतीक्षा करनी होगी।
आपके द्वारा साझा किया गया विचार एक बहुत ही गहरी सामाजिक और राजनीतिक सच्चाई को दर्शाता है। इसका सार हिंदी में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:
'किसी समझदार व्यक्ति का कथन है कि परिस्थितियों के चलते कभी-कभी किसी समाज का नेतृत्व कमजोर हो सकता है। लेकिन चाहे वह नेतृत्व कमजोर ही क्यों न हो, कम से कम एक नेतृत्व तो होता है, जिसकी वजह से उस समाज की बार्गेनिंग पावर यानी मोल-भाव की क्षमता बनी रहती है।'
आज समाज के राजनीतिक रूप से पीछे रहने का एक प्रमुख कारण यह है कि अन्य समाजों की तरह हम अपने भीतर से नेतृत्व विकसित नहीं कर पाए। इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा है कि समाज के भीतर ही कुछ वर्गों ने उपहास और अविश्वास की प्रवृत्ति अपनाकर अपने उभरते नेताओं को नकारना शुरू कर दिया। बजाय इसके कि हम किसी व्यक्ति पर विश्वास जताकर उसे नेतृत्व सौंपें, हमने उस पर कटाक्ष करना, उस पर संदेह करना और उसे अस्वीकार करना शुरू कर दिया।
यह प्रवृत्ति बेहद घातक है। क्योंकि जब कोई समाज अपने ही लोगों को खड़ा नहीं होने देता, तो वह समाज राजनीतिक ताकत से वंचित रह जाता है। नेतृत्व की जगह जब उपहास और खिंचतान ले लेती है, तो समाज केवल प्रतिक्रियात्मक बनकर रह जाता है — रचनात्मक और निर्णायक नहीं।
हमें यह समझना होगा कि अगर हम इस कठिन समय को पीछे छोड़कर फिर से उस स्वर्णिम युग की ओर बढ़ना चाहते हैं, जब समाज के पास अपने सशक्त नेता हुआ करते थे — जिन पर आलोचना के बावजूद विश्वास भी था — तो हमें अपनी सोच और व्यवहार में बड़ा बदलाव लाना होगा।
उस समय समाज अपने नेताओं को केवल आलोचना का पात्र नहीं मानता था, बल्कि उनके साथ खड़ा भी होता था। उसी विश्वास और समर्थन के कारण वे नेता सरकारों के सामने समाज की बात मजबूती से रख पाते थे, और सरकारें भी समाज के निर्णयों के सामने झुकने को मजबूर होती थीं।
अब समय आ गया है कि जाट समाज अपने भीतर नेतृत्व को पनपने दें, उसे सहयोग दें — आलोचना के साथ विश्वास भी करें — तभी समाज फिर से राजनीतिक रूप से सशक्त बन पाएगा।
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