शिक्षा और विज्ञान का अनूठा संगम: कौन हैं MDU के नए कुलपति प्रो. मिलाप पुनिया, जिन्होंने ISRO से JNU तक छोड़ी अपनी छाप?

जेएनयू (JNU) के प्रोफेसर और पूर्व इसरो (ISRO) वैज्ञानिक मिलाप पुनिया को हरियाणा के महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (MDU) का नया कुलपति (VC) नियुक्त किया गया है। राजस्थान से ताल्लुक रखने वाले प्रो. पुनिया येल यूनिवर्सिटी से फेलोशिप प्राप्त कर चुके हैं।

Apr 13, 2026 - 19:37
Apr 13, 2026 - 19:48
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शिक्षा और विज्ञान का अनूठा संगम: कौन हैं MDU के नए कुलपति प्रो. मिलाप पुनिया, जिन्होंने ISRO से JNU तक छोड़ी अपनी छाप?
MDU VC Prof. Milap Punia

रोहतक। किसी भी विश्वविद्यालय की प्रगति और उसकी अकादमिक उत्कृष्टता काफी हद तक उसके नेतृत्व पर निर्भर करती है। हरियाणा के प्रतिष्ठित महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (MDU) को अब एक ऐसा ही दूरदर्शी और बहुआयामी नेतृत्व मिला है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के वरिष्ठ प्रोफेसर और देश के जाने-माने भूगोलवेत्ता प्रोफेसर मिलाप पुनिया को MDU का नया कुलपति (Vice-Chancellor) नियुक्त किया गया है।

हरियाणा राजभवन की ओर से जारी आदेशों के बाद, शिक्षा जगत में इस नियुक्ति का व्यापक स्वागत हो रहा है। प्रोफेसर पुनिया का प्रोफाइल अपने आप में बेहद खास है, क्योंकि उनकी अकादमिक यात्रा केवल एक क्लासरूम तक सीमित नहीं रही है; यह राजस्थान के एक सरकारी कॉलेज से शुरू होकर, अंतरिक्ष विज्ञान (ISRO) की प्रयोगशालाओं से गुजरते हुए, जेएनयू के सर्वोच्च बौद्धिक विमर्श तक पहुंची है।

राजस्थान के क्लासरूम से हुई शुरुआत

मूल रूप से राजस्थान की माटी से जुड़े प्रोफेसर मिलाप पुनिया का सफर शिक्षा के प्रति गहरे समर्पण की कहानी है। अपने करियर के शुरुआती दौर में, वर्ष 1998 में, उन्होंने राजस्थान सरकार के उच्च शिक्षा निदेशालय के अंतर्गत एक सहायक प्रोफेसर (Assistant Professor) के रूप में अपनी सेवाएं देना शुरू किया। एक शिक्षक के रूप में उन्होंने यहीं से छात्रों के भविष्य को गढ़ने की नींव रखी।

जब अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़ा भूगोल (ISRO का सफर)

प्रोफेसर पुनिया की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उन्होंने पारंपरिक भूगोल को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा। पृथ्वी के भौगोलिक स्वरूप को अंतरिक्ष के नजरिए से समझने की उनकी गहरी दिलचस्पी उन्हें साल 2002 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) तक ले गई।

देहरादून स्थित 'भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान' (IIRS) के 'फोटोग्रामेट्री और रिमोट सेंसिंग डिवीजन' में बतौर वैज्ञानिक काम करते हुए उन्होंने सैटेलाइट डेटा और अर्बन प्लानिंग पर शानदार काम किया। इसी दौरान उन्होंने संयुक्त राष्ट्र (UN) से संबद्ध 'सेंटर फॉर स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी एजुकेशन इन एशिया एंड द पैसिफिक' (CSSTEAP) में भी अपनी अहम सेवाएं दीं, जिससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान मिली।

जेएनयू (JNU) में अकादमिक नेतृत्व

इसरो में अपनी वैज्ञानिक कुशलता साबित करने के बाद, प्रोफेसर पुनिया का सफर देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान 'जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय' (JNU) की ओर मुड़ा। यहां वे 'स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज' के तहत आने वाले 'सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ रीजनल डेवलपमेंट' (CSRD) में प्रोफेसर नियुक्त हुए और बाद में इस विभाग के अध्यक्ष (Chairperson) का महत्वपूर्ण पद भी संभाला।

उन्होंने 'रिमोट सेंसिंग' और भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) जैसी जटिल वैज्ञानिक तकनीकों को समाज विज्ञान (Social Sciences) के साथ जोड़ने का अभूतपूर्व काम किया है।

येल (Yale) यूनिवर्सिटी और ग्लोबल पहचान

प्रोफेसर पुनिया के शोध कार्यों की धमक सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। अर्बन हीट आइलैंड, तेजी से बढ़ते शहरीकरण (Urban Sprawl) और आपदा प्रबंधन पर उनके शोध को वैश्विक स्तर पर सराहा गया है।

  • वर्ष 2012 में उन्हें 'इंडो-यूएस नॉलेज इनिशिएटिव' के तहत बेहद प्रतिष्ठित 'रामन फेलोशिप' से नवाजा गया।
  • इस फेलोशिप के जरिए उन्होंने अमेरिका की विश्व प्रसिद्ध 'येल यूनिवर्सिटी' (Yale University) में पोस्ट-डॉक्टोरल रिसर्च की।

उनके अकादमिक कद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 'गूगल स्कॉलर' पर दुनिया भर के शोधकर्ताओं ने उनके रिसर्च पेपर्स को 1,600 से अधिक बार साइट (Cite) किया है। इसके अलावा, उन्होंने शहरीकरण और आपदा प्रबंधन पर कई प्रतिष्ठित किताबें भी लिखी हैं।

MDU के लिए एक नई शुरुआत

प्रोफेसर पुनिया को अगले तीन साल या 68 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक के लिए एमडीयू का कुलपति नियुक्त किया गया है। उनके पास एक विशुद्ध वैज्ञानिक संस्था (ISRO) के अनुशासन और जेएनयू जैसे जीवंत विश्वविद्यालय के अकादमिक विमर्श का एक दुर्लभ और अनूठा संयोजन है।

शिक्षाविदों और छात्रों का मानना है कि प्रोफेसर मिलाप पुनिया का यह समृद्ध और बहुआयामी अनुभव महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय को न केवल रिसर्च और इनोवेशन के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थान की एक मजबूत पहचान भी स्थापित करेगा।

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