Rajasthan News: राजस्थान में परिसीमन की सुगबुगाहट: गजेंद्र शेखावत, राजकुमार रोत और अमराराम की लोकसभा सीटों पर चल सकती है कैंची, जानें कौन सी 7 सीटें बंटेंगी
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की एक हालिया अध्ययन रिपोर्ट के बाद राजस्थान की राजनीति में सीटों के पुनर्गठन और परिसीमन (Delimitation) को लेकर हलचल तेज हो गई है।
नई दिल्ली। देश में आगामी समय में होने वाले लोकसभा सीटों के पुनर्गठन और परिसीमन (Delimitation) को लेकर एक बड़ी और चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की एक ताजा अध्ययन रिपोर्ट में राजस्थान के प्रशासनिक और राजनीतिक भूगोल में बड़े बदलावों के संकेत मिले हैं।
इस रिपोर्ट की सिफारिशों और अनुमानों के अनुसार, राजस्थान की 7 बड़ी लोकसभा सीटों का विभाजन या उनके दायरे में बड़ा फेरबदल किया जा सकता है। इस संभावित परिसीमन की सबसे बड़ी गाज सूबे के कई दिग्गज और हाई-प्रोफाइल नेताओं की सीटों पर गिर सकती है।
इन दिग्गज नेताओं की सीटों पर मंडराया संकट
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा उन सीटों की है, जहां से मौजूदा समय में बड़े राजनीतिक चेहरे सांसद हैं:
गजेंद्र सिंह शेखावत (जोधपुर): केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की सीट जोधपुर का भूगोल इस परिसीमन के बाद पूरी तरह बदल सकता है।
राजकुमार रोत (बांसवाड़ा): भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के फायरब्रांड नेता राजकुमार रोत की आदिवासी बहुल सीट बांसवाड़ा-डुंगरपुर भी इस पुनर्गठन के दायरे में आ रही है।
अमराराम (सीकर): माकपा (CPI-M) के वरिष्ठ नेता और शेखावटी के बड़े चेहरे अमराराम की सीकर लोकसभा सीट को भी विभाजित या पुनर्गठित किए जाने की सिफारिश की गई है।
क्या कहता है सीटों का मौजूदा राजनीतिक समीकरण?
EAC-PM की इस स्टडी रिपोर्ट में जिन 7 लोकसभा सीटों के विभाजन या पुनर्गठन की संभावना जताई गई है, उनका वर्तमान राजनीतिक गणित बेहद दिलचस्प है। इन 7 सीटों का झुकाव किसी एक दल की तरफ नहीं बल्कि पूरी तरह मिला-जुला है:
भाजपा (BJP): इन 7 सीटों में से 4 सीटें वर्तमान में सत्ताधारी दल भाजपा के कब्जे में हैं।
कांग्रेस (Congress): 1 सीट मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के पास है।
लेफ्ट (Left - CPI-M): 1 सीट वामपंथी दल (सीकर) के खाते में है।
बाप (BAP): 1 सीट भारत आदिवासी पार्टी (बांसवाड़ा) के पास है।
क्यों पड़ रही है परिसीमन और विभाजन की जरूरत?
प्रशासनिक और जनसांख्यिकीय सूत्रों के अनुसार, राजस्थान के कुछ लोकसभा क्षेत्रों का क्षेत्रफल और मतदाता संख्या देश के कई छोटे राज्यों से भी अधिक हो चुकी है।
विशाल भौगोलिक दायरा: पश्चिमी राजस्थान और आदिवासी अंचल की कुछ सीटों का भौगोलिक विस्तार इतना बड़ा है कि एक सांसद के लिए पूरे क्षेत्र की जनता तक पहुंचना और विकास योजनाओं की निगरानी करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है।
जनसंख्या का असंतुलन: पिछले दो-तीन दशकों में कुछ क्षेत्रों में आबादी का घनत्व तेजी से बढ़ा है, जिसके चलते प्रतिनिधित्व के समान अधिकार को बनाए रखने के लिए इन सीटों को दो भागों में बांटना या उनके कुछ हिस्सों को पड़ोसी सीटों में शामिल करना तकनीकी रूप से जरूरी माना जा रहा है।
सियासी गलियारों में कयासबाजी का दौर शुरू
EAC-PM की यह रिपोर्ट हालांकि अभी एक अध्ययन और सिफारिशी स्तर पर है, लेकिन इसने राजस्थान की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। यदि भविष्य में इन सिफारिशों को आधार बनाकर परिसीमन लागू किया जाता है, तो कई स्थापित नेताओं के पारंपरिक वोट बैंक बिखर सकते हैं और नए समीकरणों का जन्म हो सकता है। फिलहाल, सभी राजनीतिक दल इस रिपोर्ट के हर पहलू का बारीकी से अध्ययन करने में जुट गए हैं।
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