सत्र की शुरुआत से पहले पीएम मोदी ने ‘डिलिवरी, न कि ड्रामा’ का संदेश दिया, फिर भी विपक्ष पहले दिन से ही हंगामे पर कायम
शीतकालीन सत्र की शुरुआत से पहले पीएम मोदी ने कामकाज और नीति-चर्चा पर जोर दिया, लेकिन विपक्ष ने पहले दिन से ही हंगामा किया। पिछले सत्रों की तरह इस बार भी व्यवधान की वही पुरानी कहानी दोहराई गई। मोदी सरकार 13 महत्वपूर्ण विधेयकों और सुधारों पर आगे बढ़ रही है, जबकि विपक्ष सदन को ठप करने में जुटा है। इससे संसद की उत्पादकता और लोकतांत्रिक संस्कृति दोनों प्रभावित हो रही हैं।
दिल्ली। संसद का शीतकालीन सत्र 1 दिसंबर 2025 से शुरू हुआ और 19 दिसंबर तक चलेगा। सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को स्पष्ट संदेश दिया कि संसद में काम होना चाहिए, हंगामा नहीं। उन्होंने कहा कि “यहाँ डिलिवरी होनी चाहिए, ड्रामा नहीं। नीति पर चर्चा होनी चाहिए, नारेबाज़ी नहीं।” उनका मकसद साफ था-सदन का समय राष्ट्रहित और विकास में लगे।
लेकिन पहले ही दिन, लोकसभा में SIR मुद्दे पर इतना शोर हुआ कि सदन पूरे दिन के लिए स्थगित करना पड़ा। यह वही पुराना पैटर्न है, जो पिछले कई सत्रों से चलता आ रहा है। हर सर्वदलीय बैठक में सहयोग का आश्वासन देने के बाद भी विपक्ष अक्सर तय एजेंडा के बजाय व्यवधान की “स्क्रिप्ट” लेकर आता है।
दुनिया के कई लोकतंत्रों में शोर-शराबा होता है, लेकिन लगातार और जानबूझकर चलने वाली बाधा अब भारतीय विपक्ष की पहचान बन चुकी है। रिकॉर्ड भी यही बताता है। पिछले मानसून सत्र में बिहार चुनाव प्रक्रिया और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों को लेकर हंगामा चला। जुलाई–अगस्त 2024 में लोकसभा सिर्फ 29% और राज्यसभा 34% ही चल सकी। 2024 के शीतकालीन सत्र में भी लोकसभा की उत्पादकता सिर्फ 52% और राज्यसभा की 39% रही। 18वीं लोकसभा के मानसून सत्र में 419 प्रश्न सूचीबद्ध थे, लेकिन लगातार व्यवधानों के कारण मात्र 55 प्रश्नों का उत्तर दिया जा सका।
यह सिलसिला नया नहीं है। 2023 के बजट सत्र को विपक्ष ने हिंडनबर्ग–अदाणी मुद्दे पर बर्बाद किया। 2023 के शीतकालीन सत्र में कथित Apple अलर्ट को लेकर इतना हंगामा हुआ, जबकि बाद में Apple ने ही इन दावों को खारिज कर दिया। 2021 में पेगासस और राफेल जैसे मुद्दों पर शोर मचाकर पूरा सत्र प्रभावित किया गया। बाद में ये आरोप न अदालत में टिके, न संसद में।
संसद चलाने में प्रति मिनट लगभग ₹2.5 लाख का खर्च आता है-जिसमें सांसदों का वेतन, बिजली, स्टाफ और अन्य खर्च शामिल हैं। इस हिसाब से सिर्फ इस शीतकालीन सत्र पर ही जनता के सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च होंगे। सवाल यह है-क्या यह पैसा राष्ट्रहित के काम में लगे, या राजनीतिक ड्रामेबाज़ी में?
इसके विपरीत, मोदी सरकार लगातार सुधार और डिलिवरी पर ध्यान दे रही है। पिछले 11 वर्षों में संसद में बड़े बदलाव हुए-रेल बजट को आम बजट में शामिल करना, नया संसद भवन बनाना, ऐतिहासिक नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 पारित करना और 1576 पुराने व अप्रासंगिक कानूनों को खत्म करना। सरकार अब तक 421 विधेयक पारित कर चुकी है, जो एक मजबूत और आधुनिक विधायी ढांचे की ओर बड़ा कदम है।
इस शीतकालीन सत्र में भी 13 महत्वपूर्ण विधेयक सूचीबद्ध हैं-जिनमें न्यूक्लियर एनर्जी बिल, हायर एजुकेशन कमीशन बिल, सिक्योरिटीज मार्केट्स कोड बिल, इंश्योरेंस रेगुलेशन्स संशोधन बिल और हेल्थ सिक्योरिटी एंड नेशनल सिक्योरिटी सर्विसेज बिल शामिल हैं। ये विधेयक अर्थव्यवस्था, शिक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और शासन से जुड़े अहम क्षेत्रों को मजबूत करेंगे।
लोकतंत्र में विपक्ष की असली ताकत निर्माणात्मक बहस, तर्क और जनता की समस्याओं को उठाने में होती है। लेकिन जब हर मुद्दा विरोध बन जाए, हर चर्चा को शोर में बदल दिया जाए और हर सत्र को रणभूमि जैसा बना दिया जाए, तो यह संसदीय संस्कृति को नुकसान पहुँचाता है। संसद का उद्देश्य नीति बनाना और जनता की आवाज़ को आगे लाना है, लेकिन लगातार अवरोधों से यह काम रुक जाता है।
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