NDA: भाजपा के लिए तीन फायदे: क्यों चुने गए सीपी राधाकृष्णन?
भाजपा ने उपराष्ट्रपति पद के लिए सीपी राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाकर एक साथ तीन समीकरण साधने की कोशिश की है—संघ (RSS) के प्रति नज़दीकी, दक्षिण भारत में सशक्त दखल और विवादों से मुक्त, लो-प्रोफाइल नेतृत्व। राधाकृष्णन एक पुराने संघ स्वंयसेवक हैं, दो बार तमिलनाडु के कोयंबटूर से सांसद रहे, और विवादों से दूर रहते हैं।
भाजपा ने उपराष्ट्रपति चुनाव में सीपी राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाकर रणनीतिक रूप से एक महत्वपूर्ण दांव खेला है, जो पार्टी के लिए तीन बड़े लाभ लेकर आएगा। सबसे पहले, राधाकृष्णन की आरएसएस से गहरी जुड़ाव है; वे मात्र 16 साल की उम्र से संघ के स्वंयसेवक हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भाजपा अपनी मातृसंस्था आरएसएस के साथ मजबूत संपर्क बनाए रखने का संदेश देना चाहती है। दूसरा, दक्षिण भारत में भाजपा के लिए राधाकृष्णन का होना एक सशक्त राजनीतिक संकेत है, क्योंकि वे तमिलनाडु के कोयंबटूर से दो बार सांसद रह चुके हैं, और दक्षिण भारत में भाजपा के इस प्रमुख गढ़ में पार्टी की स्थिति को और मजबूत बनाने में उनकी उम्मीदवारी अहम भूमिका निभाएगी। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण, भाजपा अब ऐसे उपराष्ट्रपति की अपेक्षा करती है जो विवादों से दूर रहे और सरकार के लिए सहजता से काम कर सके। पिछले उपराष्ट्रपति सत्यपाल मलिक और जगदीप धनखड़ के मुखर रवैये ने पार्टी में असहजता पैदा की थी, जबकि राधाकृष्णन की छवि विवाद मुक्त और पार्टी के प्रति समर्पित नेता की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी राधाकृष्णन की खेल प्रेमी लेकिन राजनीति में अनुशासित और संतुलित भूमिका की खुले शब्दों में प्रशंसा की है, जो साफ बताती है कि भाजपा अब ऐसे नेतृत्व को तरजीह देती है, जो स्थिरता और एकजुटता का प्रतीक हो सके और पार्टी के संदेश को मजबूती से आगे बढ़ाए। इस तरह, सीपी राधाकृष्णन की उम्मीदवारी भाजपा के लिए न केवल चुनाव जीतने की कुंजी है, बल्कि उनकी उपस्थिति से पार्टी को आरएसएस के साथ घनिष्ठता, दक्षिण भारतीय राजनीति में मजबूती और बिना विवाद के समर्पित नेतृत्व का लाभ पूरे पैमाने पर मिलेगा।
पार्टी को एक साथ तीन बड़े फायदे होंगे
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आरएसएस की नज़दीकी: सीपी राधाकृष्णन 16 साल की उम्र से आरएसएस से जुड़े हैं। उनकी उम्मीदवारी से भाजपाइयों और स्वयंसेवकों में संदेश गया है कि पार्टी मातृसंगठन आरएसएस से और नज़दीक रहना चाहती है।
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दक्षिण भारत में मजबूत संदेश: राधाकृष्णन तमिलनाडु के कोयंबटूर से दो बार सांसद रहे हैं, जो दक्षिण में भाजपा का गढ़ है। अगले साल तमिलनाडु में चुनाव हैं, ऐसे समय उनको मौका देना साउथ राजनीति की दृष्टि से अहम है।
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विवादों से मुक्ति और लो-प्रोफाइल नेतृत्व: पिछले उपराष्ट्रपतियों, जैसे सत्यपाल मलिक और जगदीप धनखड़, ने कई बार सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा की थी। लेकिन सीपी राधाकृष्णन विवादों से दूर रहते हैं और पार्टीलाइन के प्रति समर्पित हैं—यही वजह है कि उन पर सर्वसम्मति बनी।
साथ ही, पीएम मोदी ने खुद राधाकृष्णन की खेल प्रेमी लेकिन राजनीति में 'खेल' से दूर रहने वाली छवि की तारीफ कर यह भी साफ कर दिया है कि भाजपा अब ऐसे उपराष्ट्रपति चाहती है, जो सरकार के लिए सहज हों और पार्टी के संदेश को मज़बूत करें।
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सीपी राधाकृष्णन (Chandrapuram Ponnusamy Radhakrishnan) एक वरिष्ठ भारतीय राजनेता और व्यवसायी हैं। उनका जन्म 20 अक्टूबर 1957 को हुआ था।
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वे 1998 और 1999 में कोयंबटूर से दो बार सांसद चुने गए हैं और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तमिलनाडु प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं (2004-2007)।
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राधाकृष्णन ने तमिलनाडु में 93 दिनों की रथ यात्रा निकाली, जिसमें उन्होंने भारतीय नदियों को जोड़ने, अस्पृश्यता उन्मूलन, और आतंकवाद के खिलाफ अभियान चलाया।
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उन्होंने तमिलनाडु के कोयंबटूर लोकसभा क्षेत्र से 2014 और 2019 में सांसद पद के लिए भाजपा उम्मीदवार के रूप में हिस्सा लिया।
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2023 में उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया, और 2024 में महाराष्ट्र का राज्यपाल नियुक्त किया गया।
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वे भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य भी रह चुके हैं और दक्षिण भारत के वरिष्ठ भाजपा नेताओं में गिने जाते हैं। उन्हें तमिलनाडु का "मोदी" भी कहा जाता है।
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जुलाई 2024 से महाराष्ट्र के राज्यपाल पद पर हैं और अगस्त 2025 में NDA के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनाए गए हैं।
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