5 अगस्त 2019 को सत्यपाल मलिक जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल थे, उन्होंने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाते हुए केंद्र सरकार के निर्णय - अनुच्छेद 370 और 35A हटाने- को ज़मीन पर सफलतापूर्वक लागू करवाया।
और ठीक छह साल बाद, उसी 5 अगस्त 2025 को, उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। ऐसे व्यक्तित्व की जीवन यात्रा, ग्रामीण पृष्ठभूमि से अपने संघर्षों की शुरुआत करने वाले युवाओं के लिए एक प्रेरणा है। आइए जानते हैं ऐसे धरतीपुत्र के बारे में-
वो साल 1946 था और दिन था 24 जुलाई, जब उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले के हिसवाड़ा गांव में एक जाट किसान परिवार ने एक बेटा पैदा किया, नाम रखा गया—सत्यपाल मलिक। गाँव की मिट्टी, खेतों की मेड़ और किसान की मेहनत उनके बचपन के दोस्त थे। उनके पिता बुध सिंह का देहांत बचपन में ही हो गया, लेकिन माँ जगबीर देवी ने बेटे को साहस और आत्मनिर्भरता की प्रतिज्ञा दी।
उनके जीवन की सबसे पहली शिक्षक वही मिट्टी बनी—जो सिखाती थी कि मेहनत का फल मिलता है, लेकिन मज़बूत इरादों से ही हार को भी पार किया जा सकता है।
मेरठ विश्वविद्यालय से पढ़ाई की शुरुआत
बचपन की चुनौतियों ने उन्हें पढ़ने की ओर आकर्षित किया। उन्होंने मेरठ विश्वविद्यालय (तब की चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी) से B.Sc (1966) किया, और उसके बाद LLB (1969) पूरा किया ।
1968‑69 के आस-पास, वे छात्रसंघ अध्यक्ष बने—उस वक्त उन्होंने महसूस किया कि राजनीतिक मंच साधन हो सकता है, लेकिन संवेदनशील सोच और न्यायप्रियता से ही समाज बेहतर बनता है। राम मनोहर लोहिया की विचारधारा से प्रेरित होकर उन्होंने राजनीति को इसकी तह में जाना।
बागपत से राजनीति की राह
पढ़ाई के दौरान ही उनका मन किसान और ग्रामीण भारत की न्याय-मांगों तक पहुँचने की राह बनाने पर केंद्रित हो गया। 1974 में, चौधरी चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल (Bharatiya Kranti Dal) से वे पहले बार विधायक बने—बागपत विधानसभा से जीतकर। विधानसभा में पार्टी के चीफ व्हिप भी बने। यह समय उनके राजनीतिक सफर की नींव था—जहां से वह स्थिरता की ओर बढ़े ।
राष्ट्रीय राजनीति और सांसद की पहचान
1977 के बाद राजनीतिक भूगोल बदलने लगा। उन्होंने 1980–1989 तक दो बार राज्यसभा से सांसद के रूप में काम किया। फिर, 1989–1991 में जनता दल की टिकट से अलीगढ़ से लोकसभा सांसद चुने गए। उस दौर में उन्हें संसदीय मामलों और पर्यटन विभाग में राज्य मंत्री भी नियुक्त किया गया। उनकी पहचान किसान और ग्रामीण विकास के सशक्त वकील के रूप में बनी ।
1996 में समाजवादी पार्टी से लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार प्राप्त हुई। लेकिन हर चुनौती से शिक्षा मिली और जनता सेवा की प्रतिबद्धता और भी स्पष्ट हुई।
दल परिवर्तन – एक विचारधारा के लिए संघर्ष
उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा के दौरान कई दलों से जुड़ाव रखा—भारतीय क्रांति दल → जनता दल → कांग्रेस (1984 में शामिल हुए , तीन वर्ष बाद बोरफोर्स घोटाले पर इस्तीफा़ दे दिया) → समाजवादी पार्टी → भाजपा (2004 में शामिल) ।
2012 में उन्हें भारतीय जनता पार्टी का नेशनल उपाध्यक्ष बनाया गया। किसानों, विधायकों और संवैधानिक मुद्दों को लेकर उनकी स्पष्टता भाजपा में स्थान बनाने का मार्ग बनी।
राज्यपाल – संवैधानिक चुनौती और स्थिरता
• बिहार:
30 सितंबर 2017 से 21 अगस्त 2018, वे बिहार के राज्यपाल बने, साथ ही ओडिशा का अतिरिक्त प्रभार भी संभाला ।
• जम्मू-कश्मीर:
23 अगस्त 2018 – 30 अक्टूबर 2019 के बीच वह जम्मू एवं कश्मीर राज्यपाल रहे। इसी दौरान 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हट गया, और मलिक उस संवैधानिक निर्णय को स्थिरता देने में अहम भूमिका निभा रहे थे। उन्होंने चुनाव कराए, प्रशासन नियंत्रण में रखा, और संविधान के प्रति निष्ठा निभाई।
• गोवा और मेघालय:
3 नवंबर 2019 – 18 अगस्त 2020 तक गोवा के राज्यपाल, और
18 अगस्त 2020 – 3 अक्टूबर 2022 तक मेघालय राज्यपाल रहे।
इन दिनों भी उनका फैसला हमेशा संविधान और प्रशासनिक संतुलन पर आधारित रहा ।
संपूर्ण राजनीतिक यात्रा
छात्र राजनीति से शुरुआत
- 1966–67: मेरठ कॉलेज में छात्रसंघ अध्यक्ष बने।
- 1968–69: चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (तब मेरठ विश्वविद्यालय) छात्रसंघ अध्यक्ष बने।
विधान सभा से संसद तक
- 1974: भारतीय क्रांति दल (लोकदल से पहले) से बागपत से विधायक चुने गए, पार्टी के मुख्य सचेतक बने।
- 1975: नवगठित लोकदल के अखिल भारतीय महासचिव बने।
- 1980: लोकदल से राज्यसभा सांसद बने।
- 1984: कांग्रेस में शामिल हुए।
- 1986: कांग्रेस विधायक से राज्यसभा सांसद, यूपी कांग्रेस समिति के महासचिव बने।
- 1987: बोफोर्स घोटाले पर नाराज़ होकर कांग्रेस और राज्यसभा से इस्तीफा दिया, जनमोर्चा गठित की, फिर जनता दल में विलय किया।
- 1987–91: जनता दल के सचिव और प्रवक्ता बने।
- 1989: जनता दल से अलीगढ़ से लोकसभा सांसद चुने गए, संसदीय मामलों और पर्यटन मंत्रालय में राज्य मंत्री बने।
भाजपा और राष्ट्रीय नेतृत्व
- 2004: भाजपा में शामिल हुए, बागपत लोकसभा चुनाव लड़े।
- 2005–06: यूपी भाजपा के उपाध्यक्ष बने।
- 2009: भाजपा किसान मोर्चा के अखिल भारतीय प्रभारी नियुक्त किए गए।
- 2012: भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने।
- 2014: भाजपा संसद घोषणापत्र की कृषि उप-समिति के अध्यक्ष बने तथा कृषि रैलियों को संबोधित किया।
विवादों से टकराने का साहस
• पुलवामा हमला:
14 फरवरी 2019 को पुलवामा हमले पर मलिक ने केंद्र सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाई। उन्होंने कहा कि CRPF को फ्लाईट देने से इनकार उनके और सरकार की लापरवाही थी—यह एक साहसिक पब्लिक स्टैंड था।
• किरू हाइड्रोपावर घोटाला:
Kiru परियोजना (₹2,200 करोड़) में CBI ने मई 2025 में मलिक और 5 अन्य पर चार्जशीट दर्ज की। यह भ्रष्टाचार का मामला आरोपों से भरा था, जिसमें कहा गया कि उन्हें ₹300 करोड़ की रिश्वत दी गई थी, उन्होंने मना किया। उन्होंने खुद आरोपियों की जांच का आग्रह किया, लेकिन फिर भी उन्हें निशाना बनाया गया ।
उन्होंने अस्पताल बिस्तर से भी बताया था कि उनकी हालत बहुत खराब है, लेकिन उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा।
अंतिम क्षण और विरासत
मई 2025 में दिल्ली के Ram Manohar Lohia अस्पताल में भर्ती हुए। डायलिसिस और इलाज के दौरान उन्हें गंभीर संक्रमण हुआ। अंततः 5 अगस्त 2025, दोपहर लगभग 1 बजे, उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी उम्र 79 वर्ष थी, उनका निधन 5 अगस्त को हुआ है जिस दिन जम्मू कश्मीर का अनुच्छेद 370 हटाया गया था।
शायद यह संयोग नहीं, बल्कि एक ऐसे किसानपुत्र को, जिसने खेतों की धूप से चलकर राजभवन की दीवारों में भी जनता की आवाज़ को जिन्दा रखा को इतिहास की तरफ़ से एक सम्मानजनक विदाई है।
वहीं उनकी अंतिम सांस का उस तारीख पर रुकना, जब देश ने एक नई शुरुआत की थी- यह संयोग उन्हें हमेशा के लिए अमर बना देगा।