मनरेगा से आगे: क्यों VB-G RAM-G एक्ट बना भारत का सबसे बहस वाला ग्रामीण रोज़गार क़ानून
VB-G RAM-G कानून मनरेगा का उन्नत रूप है, जो 125 दिन की रोज़गार गारंटी, पारदर्शी भुगतान, आधार-बायोमेट्रिक से फर्जी लाभार्थियों पर रोक और योजनाबद्ध ग्रामीण विकास पर ज़ोर देता है। 60 दिन का कार्य-विराम खेती के मौसम के लिए है और काम न मिलने पर भत्ता अनिवार्य है। इसका लक्ष्य ग्रामीणों को ज़्यादा सुरक्षित, ईमानदार और टिकाऊ रोज़गार देना है।
भारत के गाँव सिर्फ़ नक़्शे पर बसे छोटे बिंदु नहीं हैं — वे देश की आत्मा हैं। यहीं से अन्न उगता है, यहीं से मज़दूर निकलते हैं और यहीं से भारत की असली अर्थव्यवस्था चलती है। पिछले दो दशकों में भारत ने ग्रामीण गरीबी, पलायन और बेरोज़गारी से लड़ने के लिए कई योजनाएँ बनाईं, जिनमें सबसे प्रभावशाली योजना रही मनरेगा। इस योजना ने करोड़ों परिवारों को भूख से बचाया और काम की गारंटी दी। लेकिन समय के साथ यह साफ़ हो गया कि एक योजना जो 2005 की परिस्थितियों में बनी थी, वह 2025 के ग्रामीण भारत की सच्चाइयों से मेल नहीं खा रही थी।
इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने विकसित भारत – गारंटी फॉर रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) यानी VB-G RAM-G Act लागू किया। इसे लेकर देशभर में तीखी बहस छिड़ गई। कुछ लोग इसे मनरेगा का अंत बता रहे हैं, कुछ इसे गरीबों के अधिकारों पर हमला कह रहे हैं। लेकिन अगर इस कानून को भावनाओं की जगह तथ्यों और ज़मीनी सच्चाइयों से देखा जाए, तो यह ग्रामीण भारत की रोज़गार व्यवस्था को एक नए, ज़्यादा पारदर्शी और ज़्यादा टिकाऊ रास्ते पर ले जाने की कोशिश नज़र आती है।
बदली हुई ग्रामीण हकीकत और नए कानून की ज़रूरत
जब मनरेगा लागू हुआ था, तब भारत का गाँव आज से बिल्कुल अलग था। उस समय ग्रामीण गरीबी 25 प्रतिशत से ज़्यादा थी, खेती संकट में थी और करोड़ों लोग रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे थे। मनरेगा ने इस संकट के समय ग्रामीण परिवारों को एक मज़बूत सहारा दिया। 100 दिन का गारंटीड काम लाखों परिवारों के लिए जीवन रेखा बन गया।
लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार 2011–12 में जहाँ ग्रामीण गरीबी 25.7 प्रतिशत थी, वहीं 2023–24 में यह घटकर 4.86 प्रतिशत रह गई है। गाँवों में अब पहले से ज़्यादा वैकल्पिक रोज़गार हैं, लोग माइग्रेशन कर रहे हैं, खेती में मशीनीकरण बढ़ रहा है। पर मनरेगा की संरचना वही रही।
इसका नतीजा यह हुआ कि लाखों जॉब कार्ड ऐसे लोगों के नाम पर चल रहे थे जो या तो मर चुके थे या शहरों में बस चुके थे। इन “निष्क्रिय” जॉब कार्डों के ज़रिये बड़े पैमाने पर फर्जी मजदूरी निकाली जा रही थी। पैसा बिचौलियों और भ्रष्ट नेटवर्क में फँस जाता था।
VB-G RAM-G कानून इसी टूटती हुई व्यवस्था को सुधारने का प्रयास है-ताकि ग्रामीण रोज़गार सिर्फ़ काग़ज़ पर नहीं, बल्कि ज़मीन पर ईमानदारी से पहुँ
खेती और रोज़गार के बीच संतुलन
नए कानून का सबसे विवादास्पद प्रावधान है — 60 दिन का अनिवार्य कार्य-विराम। पहली नज़र में यह मज़दूर विरोधी लगता है, लेकिन इसका असली उद्देश्य खेती को बचाना है। वर्षों से यह देखा गया कि जब बुआई या कटाई का मौसम आता है, तब मज़दूर सरकारी कामों में चले जाते हैं। इससे किसान को मज़दूर नहीं मिलते और फसल को नुकसान होता है।
यह चिंता नई नहीं है। तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार ने भी अपने समय में ग्रामीण विकास मंत्रालय को पत्र लिखकर कहा था कि साल में कम से कम कुछ महीने मनरेगा से मुक्त होने चाहिए, ताकि किसान अपने खेत संभाल सकें। VB-G RAM-G इसी सोच को संस्थागत रूप देता है। लेकिन इसमें एक अहम बात है — ये 60 दिन केंद्र नहीं, बल्कि राज्य तय करेंगे। हर राज्य अपनी फसल चक्र के अनुसार यह अवधि चुन सकता है। इससे न तो मज़दूर की रोज़ी छिनेगी और न ही किसान की खेती प्रभावित होगी। यह क़ानून रोज़गार और कृषि के बीच एक ज़रूरी संतुलन बनाने की कोशिश करता है।
भ्रष्टाचार से योजनाबद्ध विकास की ओर
मनरेगा का सबसे बड़ा संकट था-अव्यवस्था और भ्रष्टाचार। काम माँगा जाता था, लेकिन यह तय नहीं होता था कि किस जगह कौन सा काम होना चाहिए। कई बार सिर्फ़ मजदूरी निकालने के लिए बेकार की खुदाई होती थी, जो बाद में भर दी जाती थी।
VB-G RAM-G इस पूरी व्यवस्था को बदल देता है। अब रोज़गार तभी खुलेगा जब कोई वास्तविक, पहले से स्वीकृत परियोजना होगी — जैसे तालाब, सड़क, सिंचाई चैनल, जल संरक्षण ढांचा या पंचायत भवन। ये सभी परियोजनाएँ विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं से लेकर जिला, राज्य और अंत में राष्ट्रीय ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर स्टैक से जुड़ी होंगी।
साथ ही आधार, बायोमेट्रिक हाज़िरी और नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम से पैसा सीधे मज़दूर के बैंक खाते में जाएगा। पहले जहाँ सिर्फ़ 0.76 करोड़ मज़दूर आधार से सत्यापित थे, अब पूरा सिस्टम डिजिटल और पारदर्शी हो चुका है। इससे फर्जी लाभार्थियों और बिचौलियों का रास्ता लगभग बंद हो जाता है।
मज़दूरी, अधिकार और 125 दिन की गारंटी
इस कानून की एक बड़ी विशेषता है कि यह मज़दूरी को कानूनी रूप से सुरक्षित बनाता है। इसमें साफ़ लिखा है कि मज़दूरी कभी घटाई नहीं जा सकती — सिर्फ़ बढ़ाई जा सकती है। सरकार महंगाई के अनुसार इसे समय-समय पर संशोधित कर सकती है।
सबसे अहम बदलाव है रोज़गार गारंटी का 100 से बढ़कर 125 दिन होना। यह ग्रामीण परिवारों के लिए अतिरिक्त सुरक्षा है। अगर कोई मज़दूर काम माँगता है और 15 दिन में काम नहीं मिलता, तो उसे बेरोज़गारी भत्ता देना सरकार की कानूनी ज़िम्मेदारी है। राज्य सरकारें चाहें तो इससे भी ज़्यादा दिन काम दे सकती हैं, लेकिन यह उनकी नीति का निर्णय होगा — मज़दूरों के अधिकार कम नहीं होंगे।
VB-G RAM-G कानून को अगर सिर्फ़ नाम बदलने या राजनीतिक चश्मे से देखा जाए, तो इसकी असली भावना छूट जाती है। यह कानून ग्रामीण भारत की बदलती ज़मीनी हकीकत को स्वीकार करता है और एक ऐसी रोज़गार व्यवस्था बनाना चाहता है जो पारदर्शी हो, ईमानदार हो और टिकाऊ विकास पर आधारित हो। यह सिर्फ़ मजदूरी देने की योजना नहीं है, बल्कि गाँवों में असली, स्थायी संपत्तियाँ बनाने और ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास है।
VB-G RAM-G भारत को राहत आधारित मॉडल से निकालकर विकास आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ओर ले जाने की एक गंभीर कोशिश है- और यही इसकी सबसे बड़ी पहचान है।
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