MP Col. Sonaram Choudhary: खामोश हुई किसानों की आवाज, चार बार MP रहे कर्नल सोनाराम चौधरी नहीं रहे

Sonaram Choudhary: एक साधारण किसान परिवार में जन्मे सोनाराम ने अपनी मेहनत, दृढ़ता और समर्पण से फौज, राजनीति और समाजसेवा की ऊंचाइयाँ छुईं।

Aug 21, 2025 - 19:48
Aug 21, 2025 - 19:49
 0
MP Col. Sonaram Choudhary: खामोश हुई किसानों की आवाज, चार बार MP रहे कर्नल सोनाराम चौधरी नहीं रहे
Colonel Sonaram Choudhary

भारत ने एक ऐसे वीर सपूत को खो दिया है, जिनका नाम देश की सेना और राजनीति के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा। कर्नल सोनाराम चौधरी, जिनकी गिनती देश में जवानों और नेताओं के रूप में होती थी, अब इस दुनिया में नहीं रहे। दिल्ली के एक अस्पताल में 80 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके जीवन का सफर और उनके द्वारा किए गए काम हमेशा याद रखे जाएंगे। ये कहानी है एक ऐसे इंसान की जिसने अपने देश, अपनी जनता और समाज के लिए समर्पित जीवन जिया।

कर्नल सोनाराम चौधरी: जीवन, संघर्ष और उपलब्धियां

राजस्थान के जैसलमेर जिले के छोटे से गांव मोहनगढ़ में 31 मार्च 1945 को जन्मे कर्नल सोनाराम चौधरी (पवड़ा) का जीवन संघर्षों, सेवा और उपलब्धियों की मिसाल है। एक साधारण किसान परिवार में जन्मे सोनाराम ने अपनी मेहनत, दृढ़ता और समर्पण से फौज, राजनीति और समाजसेवा की ऊंचाइयाँ छुईं। उनके पिता उदाराम चौधरी और माता रतनी बाई थीं। शुरुआती शिक्षा उन्होंने जैसलमेर के स्कूलों से ली और बाद में जोधपुर के मल्टीपर्पज़ स्कूल और एमबीएम इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया। इंजीनियरिंग में बीई की डिग्री के साथ-साथ, उन्हें इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया) से फैलोशिप भी मिली।

कर्नल सोनाराम का सेना में सफर 1966 से शुरू हुआ। अपने 25 साल लंबी सेना सेवा के दौरान वो जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर, डेजर्ट, दक्षिण भारत और दिल्ली जैसे विविध क्षेत्रों में तैनात रहे। उन्होंने भारत-पाकिस्तान 1971 के युद्ध में मुख्य भूमिका निभाई और आर्मी इंजीनियर्स के तौर पर कई अहम जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। उनकी बहादुरी और उत्कृष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति ने उन्हें विशिष्ट सेवा मेडल (VSM) से सम्मानित किया, साथ ही आर्मी और एयरफोर्स चीफ द्वारा उन्हें दो बार प्रशंसा पत्र भी दिया गया। उनकी सेवा यात्रा में वे प्लाटून कमांडर, गेरिसन इंजीनियर, फील्ड कंपनी कमांडर, बॉर्डर रोड्स टास्क फोर्स कमांडर, चीफ इंजीनियर जैसी अहम ज़िम्मेदारियां निभा चुके थे।

1994 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा। कांग्रेस पार्टी से जुड़े और 1996, 1998 तथा 1999 में लगातार तीन बार बाड़मेर-जैसलमेर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। इन कार्यकालों में वे रक्षा, रेलवे, ग्रामीण विकास, संचार, और अन्य महत्वपूर्ण समितियों के सक्रिय सदस्य रहे। उनका ध्यान खासकर ग्रामीण और किसानों की समस्याओं पर रहा। इंदिरा गांधी नहर परियोजना के जरिए बाड़मेर-जैसलमेर इलाके के किसानों के विकास में उनकी गहरी रुचि थी।

उनकी लोकप्रियता और संपर्क सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रही। वे कॉलेज के दिनों में भी छात्र राजनीति और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अध्यक्ष रहे, खेलों में बेहतरीन प्रदर्शन किया—स्कूल के दौरान बेस्ट स्पोर्ट्समैन अवार्ड जीता और आर्मी व एयरफोर्स गोल्फ क्लब के सदस्य रहे। यात्रा, फोटोग्राफी, पढ़ना और संगीत उनकी पसंदीदा रुचियाँ थीं। वे सामाजिक संस्थाओं जैसे CRY के नियमित दाता रहे, बच्चों, बुजुर्गों, और दिव्यांगों के लिए भी कार्य किया।

सोनाराम चौधरी का राजनीति में सफर भी उतार-चढ़ाव भरा रहा। 2004 में बाड़मेर से हारने के बाद 2008 में नई बनी बायतु विधानसभा सीट से विधायक बने। 2014 में कांग्रेस छोड़ बीजेपी का दामन थामा और उसी वर्ष बाड़मेर लोकसभा से भाजपा उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीतकर चौथी बार संसद पहुंचे—इस बार उन्होंने जसवंत सिंह जैसे दिग्गज को हराकर देशभर की सुर्खियां बटोरीं। हालांकि आगे राजनीति में अस्थिरता रही, वे फिर से कांग्रेस लौट आए।

उनका मानना था कि साझा प्रयासों से ही समाज और देश का भला हो सकता है। उनका जीवन संघर्ष, सेवा, सादगी और बेबाकी की मिसाल है। कर्नल सोनाराम चौधरी ने अपने कठिन रास्तों और सच्ची लगन से हर मोड़ पर नया इतिहास बनाया और राजस्थान की राजनीति व समाज सेवा में अपनी कभी न मिटने वाली छाप छोड़ी।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0