हसदेव क्षेत्र में 2024-25 में होगा हरियाली का विस्तार, 1200 एकड़ में तैयार होगा 15.68 लाख वृक्षों का जंगल

उदयपुर. राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) के एमडीओ एजेंट के बागवानी विभाग ने हसदेव क्षेत्र में खनन के बाद रिक्लेमेशन जमीन में गत वर्ष में चार लाख पौधे रोपे हैं।

April 3, 2025 - 09:59
April 3, 2025 - 14:49
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हसदेव क्षेत्र में 2024-25 में होगा हरियाली का विस्तार, 1200 एकड़ में तैयार होगा 15.68 लाख वृक्षों का जंगल

उदयपुर. राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) के एमडीओ एजेंट के बागवानी विभाग ने हसदेव क्षेत्र में खनन के बाद रिक्लेमेशन जमीन में गत वर्ष में चार लाख पौधे रोपे हैं। इसे मिलाकर अब तक कुल 15.68 लाख पेड़ों का नया जंगल तैयार कर लिया है। कुल 1200 एकड़ के इस जंगल में साल के पौधों की नर्सरी के साथ पिछले 12 वर्षों में अब तक एक लाख से ज्यादा साल के पेड़ों ने लगभग 20 से 30 फुट ऊंचाई के वृक्षों की शक्ल ले चुके हैं। वहीं मिश्रित प्लांटेशन में कई तरह के वृक्ष जैसे महुआ, खैर, बरगद, बीजा, हर्रा, बहेरा इत्यादि प्रजाति के वृक्ष शामिल हैं।

आरआरवीयूएनएल की खदान परसा ईस्ट केते बासेन खदान (पीईकेबी) सरगुजा जिले के उदयपुर तहसील में है। इसके खनन का कार्य वर्ष 2012 में शुरू हुआ इसके लिए वन विभाग द्वारा जंगलों में अपने लक्ष्य के अनुसार कुछ पेड़ों का विदोहन किया जाता है, जबकि विभाग ने संभाग में अब तक 51 लाख से ज्यादा वृक्ष लगाए हैं, जहां तक साल के पौधों को रोपने के आंकड़े का सवाल है तो यह सिलसिला पीईकेबी खदान में वर्ष 2012 में 200 से शुरू होकर 2025 में 4 लाख के करीब पहुंच चुका है। साल सहित कुल 45 तरह की प्रजातियों जिनमें, खैर, बीजा, हर्रा, बहेरा, बरगद, सागौन, महुआ के साथ-साथ कई फलदार वृक्ष जैसे आम, अमरूद, कटहल, पपीता इत्यादि के तैयार किये गए पौधों को लगाया गया।

नर्सरी में विकसित इन पौधों का रोपण कर सिंचाई के लिए हर एक पौधों में ड्रिप इरिगेशन के माध्यम से पानी देकर बड़ा किया गया। जो अब एक पूर्ण विकसित जंगल का रुप लेता जा रहा है। आज ये सभी पौधे काफी ऊंचे पेड़ बन चुके हैं जिससे इस क्षेत्र की जैव विविधता अब वापस लौटने लगी है। इस जंगल में अब कई तरह के पक्षी अपना घोंसला बनाकार रहने लगे हैं। वहीं जंगली जानवरों में बंदर, नेवला और भालू को भी देखा गया है।

आरआरवीयूएनएल की पीईकेबी खदान में स्थित बागवानी विभाग ने अपनी इस सफलता की कहानी हमसे साझा करते हुए बताया कि, “साल के वृक्ष के रीजेनरेशन के लिए हमारी टीम ने कड़ी मेहनत की है। कुछ बड़े विश्वविद्यालयों के बागवानी विभाग के प्रोफेसरों के साथ मिलकर हमने साल के बीजों के उत्पत्ति और रिजेनरेशन के लिए मई जून के महीने में जंगलों में जाकर इन बीजों को इकठ्ठा करना शुरू किया और इन्हे अपने नर्सरी में उपचार कर पौधा बनाना शुरू किया। हमने कड़ी मेहनत की और इस तरह हमारी मेहनत रंग लाई जब हमने देखा की इन बीजों से अब पौधों का आना शुरू होने लगा है। यह हमारे लिए मील का पत्थर साबित हुआ।”

इस जंगल को देखने के लिए स्थानीय बुद्धिजीवी वर्गों, व्यापारी गण सहित आमजनों को भी आमंत्रित किया जा रहा है। केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कुल सचिव ने भी यहां स्थापित इन नर्सरी का अवलोकन कर जंगलों को देखा और सराहना करते हुए कहा कि,” साल के वृक्ष वाकई में अब तक करीब 20 फुट के दिखे। यह पेड़ चुंकि धीमे गति से बढ़ता है, लेकिन यह मान्यता की इसे लगाया नहीं जा सकता अब बिल्कुल मिथ्या साबित हो चुकी है। आरआरवीयूएनएल के बागवानी विभाग का साल के वृक्ष में किया गया शोध वाकई में एक सफल शोध है।“

जंगल को देखने आई स्थानीय निवासी श्रीमती संतोषी कुर्रे और इनकी साथियों ने हमें बताया कि “यहां आकर हमने देखा कि जो जंगल कई सालों पहले काटा गया था ठीक वैसा ही एक नया जंगल कम्पनी द्वारा तैयार किया जा रहा है। जहां जंगली पेड़ खासकर साल के पौधों की नर्सरी और लगे हुए पेड़ों को देखकर हम अचंभित हुए यहां फलदार पेड़ भी लगे हुए हैं। यहां की हरियाली देखकर हमें यह विश्वास नहीं हो रहा है कि यहां कभी कोयला खदान खुली थी।”

सरगुजा में पीईकेबी ब्लॉक की सफलता के साथ, राजस्थान सरकार ने पिछड़े सरगुजा जिले में लगभग 10,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा किए हैं। साथ ही आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र होने के बावजूद अब यहां के स्थानीय, पहले की तरह सिर्फ जंगली फलों को बेचकर ही अपनी आजिविका नहीं चाहते अपितु 21 वीं सदी के भारत में विकास की मुख्यधारा से जुड़कर आधुनिक तरीके से जीवनयापन कर अपना एवं अपने ग्राम के विकास में विशेष योगदान भी दे रहे हैं, जिनके बच्चे अब आरआरवीयूएनएल के सामाजिक सहभागिता में गुणवत्ता युक्त शिक्षा के अन्तर्गत जहां एक ओर अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में टैब के द्वारा स्मार्ट शिक्षा से लेकर नाश्ता खाना कॉपी किताब इत्यादि मुफ्त में ग्रहण कर स्मार्ट बन रहे हैं.

दूसरी ओर अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं से स्थानीय लोग अब रोगमुक्त होकर अपनी जीवन शैली को आधुनिक बना रहे है। वहीं स्थनीय आदिवासी महिलाएं जो जंगल और घर की दीवारों को ही अपनी दुनिया समझती थीं वो आज अपने घर परिवार के साथ साथ अपना रोजगार स्व सहायता समूह के साथ जुड़कर हजारों रुपए कमा रही हैं और भारत की तरक्की में कंधा से कंधा मिलाकर चलने लगीं हैं।

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