उदयपुर में 55 साल की महिला ने दिया 17वें बच्चे को जन्म,यूपीजीएए संख्या नीति के सामने एक बड़ा सवाल

17वें बच्चे के जन्म से गाँव में खुशी की लहर है, लेकिन यह घटना सरकार द्वारा चलाए जा रहे परिवार नियोजन कार्यक्रमों की विफलता और आदिवासी समाज में जागरूकता की कमी को उजागर करती है।

Aug 28, 2025 - 00:07
Aug 28, 2025 - 00:09
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उदयपुर में 55 साल की महिला ने दिया 17वें बच्चे को जन्म,यूपीजीएए संख्या नीति के सामने एक बड़ा सवाल
55 year old mother

राजस्थान के उदयपुर जिले के सुदूर आदिवासी इलाके झाड़ोल के लीलावास गांव की रेखा कालबेलिया ने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में अपने 17वें बच्चे को जन्म दिया। 55 साल की उम्र में यह माँ बनना अपने आप में एक अद्भुत, लेकिन चिंताजनक घटना है। इस घटना ने सिर्फ क्षेत्र में चर्चा ही नहीं छेड़ी, बल्कि सरकार की जनसंख्या और परिवार नियोजन नीतियों पर भी सवाल खड़े कर दिए।

सरकारी नीतियां और जमीनी हकीकत

सरकार पिछले कई दशकों से “हम दो, हमारे दो” का नारा देकर परिवार छोटे रखने के प्रयास कर रही है। गांवों में नसबंदी शिविरों से लेकर जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन रेखा कालबेलिया और उनके अति बड़े परिवार की कहानी दिखाती है कि ये कोशिशें अब भी कई सुदूर क्षेत्रों में प्रभावी नहीं हो पाई हैं।

आदिवासी समाज—बड़े परिवार की मान्यता

झाड़ोल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डॉ. रोशन दरांगी ने बताया कि आदिवासी समाज में अब भी बड़े परिवार की अवधारणा प्रचलित है, और लोग स्वास्थ्य व सरकारी योजनाओं के बारे में जागरूक नहीं हैं। इसलिए, परिवार नियोजन कार्यक्रमों को जमीन पर और कारगर तरीके से लागू करने की जरूरत है।

परिवार की दास्तान—फालतू का गरीबी में ढकेला

रेखा के 17 बच्चों में से 7 लड़के और 4 लड़कियां जीवित हैं, बाकी 5 की जन्म के बाद मौत हो गई। उनके कई बच्चों की शादियां भी हो चुकी हैं और उनके अपने बच्चे भी हैं। नए सदस्य के आने की खुशी में अस्पताल पूरा परिवार—पोते-पोती और दोहिते तक—मौजूद थे। रेखा के पति कवरा कालबेलिया ने कहा कि उनके इतने बच्चे “भगवान की मर्जी” से हुए हैं और वे इसे सौभाग्य मानते हैं।

हालांकि, जीवनयापन की मुश्किलें कहीं ज्यादा साफ हैं। परिवार के एक सदस्य ने बताया कि कई बार दो जून की रोटी का इंतजाम भी मुश्किल हो जाता है, बच्चों को स्कूल भेजना तो दूर की बात है। पीएम आवास योजना से घर तो मिला था, लेकिन जमीन अपने नाम न होने के कारण वह भी छिन गया। साहूकार से कर्ज लेना और भारी ब्याज पर उसे चुकाने की जद्दोजहद—यही इनकी जिंदगी की रीढ़ है।

सरकारी दावों और जमीनी हकीकत का अंत

स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टरों ने बताया कि इस तरह के मामले सामने आते रहते हैं, जिनमें लोग अपने बच्चों की सही संख्या छिपा देते हैं। रेखा को भी उनके परिवार ने चौथी संतान बताकर भर्ती किया था, लेकिन अस्पताल में सच्चाई सामने आई। अब रेखा और उसके पति को परिवार नियोजन के प्रति जागरूक करने की कोशिश की जा रही है, ताकि आगे और बच्चे पैदा होने का खतरा न रहे।

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