टोक्यो ओलंपिक में ट्रांसजेंडर एथलीट को शामिल किए जाने पर दो धड़ों में बंटा खेल जगत

न्यूजीलैंड की लॉरेल हबर्ड ओलंपिक खेलों के इतिहास में पहली ट्रांसजेंडर एथलीट होंगी। लॉरेल महिला वर्ग के सुपर हैवीवेट 87 किलोग्राम इवेंट में भाग लेंगी। 43 साल की लॉरेल ओलंपिक में सबसे अधिक उम्र की लिफ्टर होंगी। वह जन्म के समय पुरुष थी लेकिन 2013 के बाद सर्जरी के जरिए उन्होंने खुद को एक महिला में तब्दील कर लिया था।

July 22, 2021 - 18:02
December 9, 2021 - 10:05
 0
टोक्यो ओलंपिक में ट्रांसजेंडर एथलीट को शामिल किए जाने पर दो धड़ों में बंटा खेल जगत
Laurel hubbard

न्यूजीलैंड की लॉरेल हबर्ड होंगी ओलंपिक में पहली ट्रांसजेंडर खिलाड़ी।

न्यूजीलैंड की लॉरेल हबर्ड ओलंपिक खेलों के इतिहास में पहली ट्रांसजेंडर एथलीट होंगी। लॉरेल महिला वर्ग के सुपर हैवीवेट 87 किलोग्राम इवेंट में भाग लेंगी। 43 साल की लॉरेल ओलंपिक में सबसे अधिक उम्र की लिफ्टर होंगी। वह जन्म के समय पुरुष थी लेकिन 2013 के बाद सर्जरी के जरिए उन्होंने खुद को एक महिला में तब्दील कर लिया था। वह 2013 से पहले पुरुष वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिताओं में भाग ले चुकी हैं। लॉरेल राष्ट्रमंडल और वर्ल्ड चैम्पियनशिप में भी हिस्सा ले चुकी हैं। 2020 टोक्यो ओलंपिक में प्रवेश के लिए उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी द्वारा बनाए सभी मापदंडों को पूरा किया और ओलंपिक में पहली ट्रांसजेंडर खिलाड़ी बनी। न्यूजीलैंड ओलंपिक कमेटी की प्रमुख केरेन स्मिथ ने लॉरेल के ओलंपिक में शामिल होने पर खुशी जाहीर करते हुआ कहा “खेल और न्यूजीलैंड की टीम के लिए यह एक ऐतिहासिक पल है।”

लॉरेल हबर्ड

आईओसी (अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति) ने ओलंपिक खेलों में ट्रांसजेंडरों को शामिल करने के लिए 2004 में पहली बार गाइडलाइन जारी की थी। ऐसा माना जा रहा था कि 2016 रियो ओलंपिक में कोई ट्रांसजेंडर एथलीट भाग लेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 2015 में आईओसी ने ट्रांसजेंडर समुदाय के भाग लेने को लेकर अपनी नीतियों में कुछ बदलाव किए थे। इस नीति की वजह से ही ट्रांसजेंडरों को विश्व स्तर के खेलों में हिस्सा लेना संभव हो पाया है।

जहां एक तरफ LGBT समुदाय ने इसका स्वागत किया है तो वहीं दूसरी तरफ इस निर्णय की आलोचना हो रही है। कुछ पूर्व खिलाड़ी और आलोचक इसके खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। आईओसी के नियमानुसार महिला से पुरुष में तब्दील हुए एथलीट बिना किसी रोक के ओलंपिक में हिस्सा ले सकते हैं लेकिन पुरुष से महिला श्रेणी में आने पर कुछ मानदंडों को पूरा करना होता है। पहला, ऐसे एथलीटों सबसे पहले अपना लिंग ‘महिला’ घोषित करना होगा। बदले हुए लिंग में कम से कम एथलीटों को चार साल तक रहना होगा। दूसरा, प्रतियोगिता के 12 महीने पहले तक टेस्टोस्टेरोन लेवल 10 नैनोमोल्स से कम होना चाहिए। लॉरेल इन सभी मानदंडों को पूरा कर ओलंपिक में प्रवेश पाया है। लेकिन आलोचकों का मानना है कि आईओसी की यह नीति निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित नहीं कर पाएगी। आलोचक कहते हैं कि पुरुष से महिला बने एथलीटों में दूसरी महिलाओं के मुकाबले ज्यादा ताकत होती है जिसका अतिरिक्त फायदा ट्रांसजेंडर एथलीटों को मिलता है। यह सीधे-सीधे प्रतिस्पर्धा में भाग ले रही दूसरी महिलाओं के साथ भेदभाव है। ताकत के अलावा स्पीड, स्टैमिना और टेस्टोस्टेरोन जैसे मेट्रिक्स में ट्रांसजेंडर खिलाड़ियों को प्रतियोगिता में महिलाओं के प्रति ज्यादा लाभ होता है।

Laurel hubbard

इस मामले पर बेल्जियम की वेटलिफ्टर अन्ना वैन बेलिंगन के कहा “हबर्ड को टोक्यो ओलंपिक में हिस्सा लेने देना, महिलाओं के लिए अन्यायपूर्ण हैं और एक भद्दे मज़ाक की तरह है।”

ट्रांसजेंडर को ओलंपिक में प्रवेश को लेकर खेल जगत के लोग दो धड़ों में बात चुके हैं। पूरी दुनिया में लोग आईओसी के इस फैसले की आलोचना कर रहे हैं, तो कुछ स्वागत कर रहे हैं। इसपर आईओसी अपना पक्ष रखते हुए कहता है “ओलंपिक कमेटी लगातार खेल में समावेश लाने की कोशिश करती है। हालांकि कमेटी इस निर्णय और औचित्य और सुरक्षा से जुड़े सवालों से भी वाकिफ है।”

इसमें कोई दो राय नहीं है कि ट्रांसजेंडर समुदाय से आने वाली महिला को प्रतियोगिता में भाग लेने वाली दूसरी महिलाओं के प्रति ज्यादा लाभ मिलेगा। इस बात की पुष्टि दिसंबर 2020 में ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स साइंस में छपे एक शोध पेपर ने की। शोध में पाया गया है कि पुरुष से महिला बनी एथलीटों को उनके भीतर मौजूद मेल हार्मोन का फायदा मिलता है।

दूसरी तरफ पीईएफआई (फिजिकल एजुकेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया) के राष्ट्रीय सचिव पीयूष जैन बताते हैं कि हमें आईओसी के इस निर्णय को दूसरी तरह से लेना चाहिए। हमें इस फैसले का स्वागत करना चाहिए क्योंकि LGBT समुदाय को इसके जरिए समाज में एक नए सिरे से वैधता मिलेगी। यह भी जरूरी है आईओसी भेदभाव को लेकर विचार करे और भविष्य में जरूरी और बुनियादी सुधार करे।

आईओसी का यह फैसला सराहनीय है। भविष्य के लिहाज से यह कदम बहुत जरूरी था। दुनिया भर में इस समुदाय को मुख्यधारा में लाने वाले इस फैसले ने मिसाल कायम की है। यह फैसला दुनिया भर की सरकारों को विचार करने पर मजबूर करेगा कि वह अपने देश में खेलों में भी इस समुदाय के लोगों को भी बराबरी का मौका दे। हालांकि ट्रांसजेंडर समुदाय को लेकर बहुत से देशों में कोई स्पष्ट नियम नहीं है। इस फैसले के माध्यम से इस दिशा में नए रास्ते खुलेंगे। इस समय जरूरत है कि आईओसी इस विषय के नियमों को लेकर गंभीरता से विचार करे। ट्रांसजेंडर समुदाय को मुख्यधारा में लाने के लिए अभी के नियम पर्याप्त नहीं है। ब्रिटिश जर्नल की शोध सिद्ध करती है कि केवल प्रतियोगिता से 12 महीने पहले तक टेस्टोस्टेरोन लेवल 10 नैनोमोल्स से कम होने वाली बात वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर खरी नहीं उतरती। आईओसी को इस समुदाय को लेकर नियमों में बदलाव वैज्ञानिक आधारों पर करने चाहिए। साथ ही आईओसी को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ओलंपिक खेल बिना किसी भेदभाव के संपन्न हो।

rythem.kumar27 Media Enthusiast || IIMCian || Politics || Sports || Art & Culture || Cinema || शहर में एक गांव का लड़का || IG & SC-rythem.sports27 || Old Skool!