लाचारी के पिंजरे में फँसता बिहार और उसका भविष्य

जनतंत्र के लिए आज्ञाकारिता भी ख़तरनाक है और अवज्ञा भी. ... आज देश में जहां अवज्ञा होनी चाहिए वहां आज्ञाकारिता बढ़ गई है और जहां आज्ञाकारिता होनी चाहिए, वहां अवज्ञा है. ... क़ानून में मात्रा भेद अवश्य होना चाहिए.जनतंत्र के लिए आज्ञाकारिता भी ख़तरनाक है और अवज्ञा भी. ... आज देश में जहां अवज्ञा होनी चाहिए वहां आज्ञाकारिता बढ़ गई है और जहां आज्ञाकारिता होनी चाहिए, वहां अवज्ञा है. ... क़ानून में मात्रा भेद अवश्य होना चाहिए.

April 3, 2021 - 20:22
January 2, 2022 - 06:18
 0
लाचारी के पिंजरे में फँसता बिहार और उसका भविष्य

बिहार क्या है इसे समझने के लिए शायद समाज शास्त्री भी अपनी नाकामियों को बढ़ा चढ़ा कर बताएंगे और अपनी असफलता जाहिर करेंगे ये न बता पाने में की क्या है ऐसा बिहार की धरती में जो अपने निर्माताओं( मजदूरों) को बाहर भेजती है दूसरो के लिए निर्माण करने और अपने ही आंगन में न के बराबर विकास है और और कभी न थकने वाला एक जुझारू जोश है। 

आज एक ऐसे वक्त में जब हर जगह अंदरूनी मामला कहकर किसी भी विषय से अलग या प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित न होने वालो को रोक दिया जाता है तब मैं मध्य भारत का होने के नाते समझ नही पता बिहार के विषय में विचार रखना कितना सही है कितना गलत होगा । 

मैं ये साफ कर देना चाहता हूं की मैं अभी तक गांधी मैदान और जेपी का बिहार नही देख पाया हूं लेकिन बिहारी दोस्त है मेरे इसलिए खुदको बिहार से एक अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ मानने की कोशिश में ये लेख लिख रहा हूं। 

बिहार की दो घटनाओं को हमारे समाज और समाचार में न के बराबर महत्व मिला है और उन्हें भुला दिया जायेगा हर उस घटना की तरह जो शोषण और गरीबी की याद दिलाती है। 

पहली घटना आज से एक वर्ष पहले की है जिसे बीते 25 मार्च को एक वर्ष हो गए है जब रात में अचानक संपूर्ण लॉकडाउन लगाकर आने वाले दिनों में थाली बजाकर, दिया जलाकर और गो कोरोना गो के नारे लगवाकर हमारे सत्ताधीशों ने सोचा था कि वो कोविड नाम के वायरस से निजात पाकर सुकून से अपने पुरुषार्थ का महिमामंडन करवाएंगे लेकिन जैसा कि सर्वविदित है हम अभी भी कोविड से प्रभावित है और कोविड संक्रमण के आंकड़े लगातार बढ़ रहे है बस इस बार नया ये है की वैक्सीनेशन का कार्य शुरू हो चुका है। 

आज अब न तो थाली बजवाई गई न दिया जलाने के लिए कहा गया और न ही गो कोरोना गो के नारे लगवाए गए है लेकिन तब भी जब सत्ताधीश अपनी नाकामियों को छुपाने और भूलने के प्रयत्न कर रहे है तब ये और महत्वपूर्ण हो जाता है की हम बात करे की पिछले एक साल में हमारे सरकार के लॉकडाउन से प्रभावित मजदूरों का क्या हाल उस वक्त हुआ और अभी उनकी क्या स्थिति है?

जो मजदूर घरों के लिए निकले थे आज वो फिर घर से दूर आ गए है कमाई के साधन की तलाश में।

इस विषय में अभी इसलिए लिखा जाना महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल में एक डॉक्यूमेंट्री आई है जिसका नाम है 1232 km जिसमें फिल्ममेकर ने बिहार के मजदूर के साथ उनके घर जाने तक के सफर के संघर्ष और लाचारी को दिखाया है और ये डॉक्यूमेंट्री एक सवाल समाज में जरूर छोड़ देती है की क्या बिहार के मजदूरों का कोई महत्व है या फिर उनकी जीवन सिर्फ उनकी मौत के आंकड़ों तक सीमित है। 

हमारी सत्ता और सरकार के पास कितने मजदूर घर जाने के सफर के मारे गए इसके आंकड़े भी नही है और वो ये नाकामी संसद में स्वीकार करते है , धन्य है ये राजा और उसकी प्रजा ।

खैर हमें एक प्रश्न स्वयं से पुछने कीआवश्यक्ता है की क्या हमें लेबर मिनिस्टर का नाम भी पता है ? हम सब जिम्मेदार है इस पतन के लिए जिसके कारण बिहार के मजदूर सरकार , शासन और समाज की लापरवाही के कारण मारे गए।

अब दूसरी घटना उस बिहार की है जो सुशासन के राग अलाप रहे नेताओ के राज्य में अपने जन प्रतिनिधियों को सदन के अंदर पीटते हुए देखते रहे और इस विषय में न कोई रोष प्रकट किया गया न कोई सवाल की सदन के अंदर जनता के नुमाइंदो के साथ ऐसा क्यों ? 

और धन्य है वो लोग जो ये मत देंगे की वो लोकतंत्र के लिए खतरा बन गए थे और लोकतंत्र को कमजोर कर रहे थे ।

बी. पी. मंडल द्वारा राज्यसभा में 1969 में दिया गया भाषण बरबस याद आ गया -

"जनतंत्र में अगर कोई पार्टी या व्यक्ति यह समझे कि वह ही जबतक शासन में रहेगा, तब तक संसार में उजाला रहेगा, वह गया तो सारे संसार में अंधेरा हो जाएगा, इस ढंग की मनोवृत्ति रखने वाला, चाहे कोई व्यक्ति हो या पार्टी, वह देश को रसातल में पहुंचाएगा। ... हिंदुस्तान में (सत्ता से) चिपके रहने की एक आदत पड़ गयी है, मनोवृत्ति बन गई है। उसी ने देश के वातावरण को विषाक्त कर दिया है।"

और इसके साथ आप लोहिया जी ने जो कहा था उसे पढ़िए

"एक घंटे का प्रश्नकाल होता है, लेकिन मंत्री लोग जवाब नहीं देते. उन्हें जवाब मालूम नहीं होता. ... सवाल और जवाब से अनेक बार तो ऐसा लगता है कि जैसे कोई कुश्ती या पेंच होता है या कई तरह के खेलकूद होते हैं वैसे ही सवाल जवाब देते-होते हैं. ... ऐसे मंत्रियों के खिलाफ़ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए. अक्सर मंत्रियों को बचाए रखने का प्रयत्न किया जाता है और संविधान के प्रति अपनी नादानी का भी प्रयत्न किया जाता है.

बात यह है कि बहसें चलती हैं, मगर सारा मामला तू-तू, मैं-मैं, ही में ख़त्म हो जाता है. जनता और भीतर के लोग वाह-वाह करते हैं, वाह क्या ख़ूब काटा और इस काटने की पद्धति में क़ायदे-क़ानून, नियम-सिद्धांत टूट जाते हैं. 

जनतंत्र के लिए आज्ञाकारिता भी ख़तरनाक है और अवज्ञा भी. ... आज देश में जहां अवज्ञा होनी चाहिए वहां आज्ञाकारिता बढ़ गई है और जहां आज्ञाकारिता होनी चाहिए, वहां अवज्ञा है. ... क़ानून में मात्रा भेद अवश्य होना चाहिए.

- डॉ. लोहिया"

Abhishek Tripathi तभी लिखूंगा जब वो मौन से बेहतर होगा।