भारतीय महिलाओं का ओलंपिक्स की दुनिया में पहला कदम

भारत ने 1900 से ओलम्पिक में भाग लेना शुरू कर दिया था पर 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक्स में भारत ने पहली बार महिलाओं को भारत के लिए खेलने के लिए भेजा था। हालांकि महिलाओं ने कोई बड़ी जीत नहीं हासिल की, लेकिन अवश्य रूप से, उनका प्रदर्शन अत्यंत प्रेरणादायक और सराहनीय रहा।

July 24, 2021 - 12:35
December 9, 2021 - 10:06
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भारतीय महिलाओं का ओलंपिक्स की दुनिया में पहला कदम
नीलिमा घोष

भारतीय महिलाओं का ओलंपिक्स की दुनिया में पहला कदम

विश्व भर में महिलाओं और पुरुषों की योग्यता के बीच सदियों पहले एक लकीर खींची गई थी। यह लकीर महिलाओं और पुरुषों के कार्यों को निर्धारित करती थी, एक धारणा बनाती थी कि महिलाओं को क्या करना चाहिए और कौनसे काम पुरुषों के हैं। इस लकीर ने महिलाओं और पुरुषों के बीच भेदभाव को काफी बढ़ावा दिया और यह अमूमन हर क्षेत्र में खींची गई। खेल का क्षेत्र भी कोई अलग नहीं था। खेल की दुनिया में भी शुरू से ही पुरुषों की प्रधानता रही है। यहाँ तक कि विश्व का सबसे विशाल और भव्य खेल समारोह, ओलंपिक्स भी जब 1896 में शुरू हुआ था, केवल पुरुष प्रतिभागियों के लिए आयोजित किया गया था। 1900 में पेरिस में आयोजित ओलंपिक खेलों में पहली बार महिलाओं ने इस समारोह में अपने देश का प्रतिनिधित्व किया था।

हमारे भारत देश में भी खेल-कूद, खासकर एक पेशे के तौर पर, महिलाओं के लिए कभी एक विकल्प नहीं रहा। उन्हें इस क्षेत्र से कभी जोड़ा नहीं गया क्योंकि यह खेल ‘लड़कों के लिए बने थे’। भारत में इस धारणा को तोड़ने का सफर 1952 में शुरू हुआ जब महिलाओं ने पहली बार खेलों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। यूँ तो भारत ने 1900 से ओलम्पिक में भाग लेना शुरू कर दिया था पर 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक्स में भारत ने पहली बार महिलाओं को भारत के लिए खेलने के लिए भेजा था। हालांकि महिलाओं ने कोई बड़ी जीत नहीं हासिल की, लेकिन अवश्य रूप से, उनका प्रदर्शन अत्यंत प्रेरणादायक और सराहनीय रहा।

17 वर्षीय ट्रैक एण्ड फील्ड ऐथ्लीट नीलिमा घोष ओलंम्पिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली महिला बनीं। नीलिमा बचपन से ही एक ऐथ्लीट बनने का सपना देखती थीं और 17 वर्ष की कम आयु में ही उन्होंने अपने देश का नाम रौशन करके अपने सपने को साकार कर लिया था। नीलिमा घोष ने 100 मी. की स्प्रिन्ट दौड़ और 80 मी. की हर्डल रेस में भारत की तरफ से हिस्सा लिया। 100 मी. की स्प्रिन्ट दौड़ को 13.8 सेकंड में पूरा करने के बावजूद नीलिमा आखिरी से एक ऊपर का स्थान हासिल कर पाईं। और 80 मी. की हर्डल रेस की बात करें तो उन्होंने इस प्रतियोगिता को विजेता से दो सेकंड देरी से पूरा किया।

नीलिमा घोष

नीलिमा घोष के साथ-साथ ऐथ्लीट मेरी डीसूज़ा सेकुएरा भी हेलसिंकी में आयोजित ओलंपिक खेलों में भाग लेने वाली भारतीय टोली का हिस्सा थीं। मेरी डीसूज़ा ने 100 मी. और 200 मी. की दौड़ में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। हालांकि मेरी को ओलंपिक्स में कोई खास सफलता नहीं मिली, पर आगे चलकर उनका नाम एशिया के सबसे तेज़ भागनेवालों की सूची में लिया जाने लगा। साथ ही, मेरी डिसूज़ा की गिनती चतुर्भुज प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लेने वाले विश्व के पहले कुछ खिलाड़ियों में की जाती है। मेरी डीसूज़ा सेकुएरा को 2013 में भारतीय सरकार द्वारा मेजर ध्यान चंद पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया।

मेरी डीसूज़ा

नीलिमा घोष और मेरी डीसूज़ा सेकुएरा के अलावा 1952 में ओलंपिक्स में तैराक डॉली नज़ीर और आरती साहा ने भी भारत की ओर से अपनी प्रस्तुति दर्ज की थी। डॉली नज़ीर भी 17 वर्ष की थीं जब उन्होंने ओलंपिक खेलों में भाग लिया। डॉली ने 100 मी. फ्रीस्टाइल और 200 मी. ब्रेस्टस्ट्रोक, दो तैराकी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। आरती साहा 12 साल की आयु में 1952 के ओलंपिक खेलों में भारतीय टुकड़ी की सबसे युवा महिला खिलाड़ी थीं। आरती ने 200 मी. ब्रेस्टस्ट्रोक प्रतियोगिता में भाग लिया था। ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली महिलाओं में से एक होने के साथ-साथ आरती साहा तैरकर इंग्लिश चैनल पार करने वाली पहली एशियाई महिला थीं। आरती साहा भारतीय सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित की जाने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी थीं।

आरती साहा

इन चार महिलाओं की दृढ़ता, लगन और प्रदर्शन ने एक मिसाल कायम की। 1952 के बाद महिलाओं के लिए खेल के दरवाजे हमेशा के लिए खुल गए। हालांकि सामाजिक स्वीकृति मिलने में थोड़ा समय लगा पर यह तो एक सतत प्रक्रिया है, चलती रहेगी। आज लगभग 70 वर्ष बाद, देश की बेटियों ने हर खेल में शानदार प्रदर्शन किया है। वे हमारे देश का गौरव हैं। उन्होंने समाज और प्राचीन धारणाओं से एक लड़ाई लड़ी, लोगों के ताने सुने, आसमान छूने से पहले हजारों बार गिरीं, लेकिन कभी हार नहीं मानी। अपनी मेहनत और लगन को उन्होंने अपनी असफलताओं और चुनौतियों के सामने छोटा नहीं पड़ने दिया। यह महिला खिलाड़ी उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं जो न केवल खेल बल्कि किसी भी अन्य क्षेत्र में अपना नाम और जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं।