विलुप्त होती जा रही है खेलों की विरासतें और परंपराएं

आज के समय में खेल और खिलाड़ियो के साथ न्याय नहीं हो पा रहा। मसला यह नहीं है। असल मसला है कि हमारी सरकारों ने खेलों के लिए कुछ खास नहीं किया, जिसमें सबसे बड़ा हाथ आज की मीडिया का है। खिलाड़ियों ने हमेशा से ही कम सुविधाओं में बहतर प्रदर्शन किए है।

March 13, 2021 - 20:07
January 2, 2022 - 06:25
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विलुप्त होती जा रही है खेलों की विरासतें और परंपराएं
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भारत में खेलों का अपना एक इतिहास रहा है। इस धरती पर खेल को परंपरागत तरीकों से खेले जाते रहे है। लेकिन आज के समय में खेल और उसकी विरासतें विकास की भेट चढ़ चुकी हैं। खेल अब सिर्फ दूसरे दर्जे का एक विषय बनकर रह गए हैं। ऐसा नहीं है कि लोगों ने खेलों को पूरी तरह से भुला दिया है। क्योंकि आज के दौर में चारों तरफ हम शरीर या फिटनस से जुड़े कार्य में लोगों को पाएंगे, मगर खेल अपनी विरासतों और परंपराओ को बचाने में विफल रहे है।

आज के समय में खेल और खिलाड़ियो के साथ न्याय नहीं हो पा रहा। मसला यह नहीं है। असल मसला है कि हमारी सरकारों ने खेलों के लिए कुछ खास नहीं किया, जिसमें सबसे बड़ा हाथ आज की मीडिया का है। खिलाड़ियों ने हमेशा से ही कम सुविधाओं में बहतर प्रदर्शन किए है। दरअसल,  कुछ हद तक इसके लिए लोग भी जिम्मेदार है। मीडिया में खेलों को लेकर कोई खास चर्चा नहीं होती। क्योंकि लोग आज कल खेलों को सिर्फ मनोरंजन के तौर पर देखते है, उनका सम्मान नहीं करते। डेली सोप, गाने और सिनमा को छोड़ भी दे तो आजकल लोग न्यूज चैनलों में सूचनाओं और अच्छी बहस सुनने की बजाए मनोरंजन तलाशते है। मीडिया भी खेलों की बहस को कोई खास तरहीज़ नहीं देता। ऐसा लगता है जैसे देश में बेहतर बहस करने और सुनने वाले विलुप्त हो गए हो। कुछ राजनीतिक मसलें छोड़ भी दे तो परस्पर खेलों के लिए तो लगभग यही होता है। देश में सिर्फ और सिर्फ एक मात्र लोकप्रिय खेल "क्रिकेट" की ही चर्चा होती है, मानों जैसे देश में दूसरे खेल ही नहीं है। देश और मीडिया से लगभग खेलों और उनकी चर्चाओं की परंपरा लगभग समाप्त सी हो गई है। न्यूज चैनलों पर खेलों के लिए आधे घंटे मात्र का कार्यक्रम चलाकर वह लोग अपनी जिम्मेदरी से नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। चलिए देश के सबसे लोकप्रिय खेल की ही बात करते है। देश में क्रिकेट को लेकर हर शख्स थोड़ा जज्बाती है। देश का मीडिया कभी इंडिया टीम से नीचे उतरता ही नहीं। कोई भी बहस विराट कोहली या धोनी से नीचे होती ही नहीं है। देश के मुख्यधारा के अखबारों में बड़े-बड़े कॉलम लिखने वालों की लेखनी में सिर्फ क्रिकेट या सॉकर की चर्चा होती है। क्या आप लोगों ने कभी सुना है कि किसी चैनल पर या अखबार में क्रिकेट के ही किसी लोकल खिलाड़ी या लोकल टूर्नामेंट को लेकर कोई डिबेट या चर्चा हो रही हो। इसका उत्तर 99 प्रतिशत आपको ना में ही मिलेगा। टीवी चैनलों पर आने वाले आजकल के तथाकथित खेल विशेषज्ञों को असल में खेलों की जानकारी ही नहीं है। वह बहुत समय पहले ही खेलों को कवर करना छोड़ चुके हैं और इंडिया टीम से नीचे के मैच कवर करना उनकी शान के खिलाफ समझतें है। किसी भी टीवी डिबेट में ज़मीनी स्तर पर होने वाले टूर्नामेटों और उनमें उम्दा प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को लेकर कभी कोई चर्चा होती ही नहीं है। शायद लोगों को मालूम ही नहीं होगा के उनके शहर या गांवों में कितने बड़े-छोटे टूर्नामेंट होते है और उनमें किस प्रकार युवा प्रतिभावान खिलाड़ियो ने बहतरीन प्रदर्शन किया है। अखबारों की बात करे तो लगभग सभी प्रमुख अखबारों ने लोकल टूर्नामेंटों को छापना ही बंद कर दिया है या अगर छापते भी है तो मात्र एहसान जताने के लिए।

अन्यों खेलों की बात करे तो, उनके लोकल टूर्नामेंटों की जानकारी शायद ही लोगों को हो। मुख्यधारा की मीडिया में कभी भी उनके लोकल टूर्नामेंटो की चर्चाएं नहीं होती। देश के मुख्यधारा के अखबरों ने केवल खानापूर्ति के लिए खेल पेजों पर खबरों के नाम पर लीपा-पोती ही होती है। देश के बड़े-बड़े खेल पत्रकारों ने लोकल खेलों को कवर करना बंद कर दिया है। जो खेल पत्रकारिता पहले मैदानों से होती थी वह बस अब दफ्तरों के कैबिनों में विज्ञप्तियां छापने तक सिमित रह गई है। खेल पत्रकार आज सिर्फ और सिर्फ विराट कोहली और रोनाल्डो के प्रदर्शन पर चिंता जताते है ना कि किसी गांव या शहर में पनपने वाले प्रतिभापूर्ण युवा खिलाड़ी पर। इतना ही नहीं। जो पत्रकार कवर भी करना चाहते है उनके लिए सरकार ने सभी प्रमुख मैदानों में पत्रकारों के प्रवेश पर रोक लगा रखी है। हालांकि खेलों के प्रति जो रूचि लोगों में एक समय पर होती थी वो अब दिखाई नहीं देती। यही कारण है कि देश की जनता में खेलों और उनकी जानकारियों को लेकर कोई जागरूकता ही नहीं है। आजकल के समय में खेलों को गंभीरता से नहीं लिया जाता। अखबारों और चैनलों से खेलों को लेकर चर्चाएं लगभग नदारद है। ऐसा प्रतीत होता है मानों खेलों पर काल मंडरा रहा हो। यह एक गंभीर समस्या है। इसके निदान के लिए लोगों को स्वंय सामने आना पडे़गा। खेलों की पुरानी परंपरओं और विरासतों को नया बल देना होगा। लोगों को अपने अखबारों व टीवी चैनलों के सामने प्रश्न दागने होंगे कि खेलों को लेकर तमाम अखबारों और टीवी चैनलों की रिपोर्टिंग इतनी निम्न स्तर की क्यों हो गई है| सरकारों से भी प्रश्न पूछने पड़ेगें कि, वे खेलों की विरासत को बचाने के लिए क्या कुछ कदम उठा रही है। खेलों को लेकर एक हष्ट-पुष्ट वातावरण बनाना जरूरी है।

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