तालिबान 2.0 के ख़िलाफ़ क्या होगी मोदी 2.0 की रणनीति?

वर्तमान में तालिबान के सत्ता में होने के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गयी है। पाकिस्तान,चीन और तालिबान के त्रिकोणात्मक गठजोड़ के बाद अब भारत को अफगानिस्तान में अपने प्रभाव के लिए लंबी कूटनीतिक लड़ाई के लिए तैयारी रहना पड़ेगा।

August 24, 2021 - 13:18
December 9, 2021 - 10:37
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तालिबान 2.0 के ख़िलाफ़ क्या होगी मोदी 2.0 की रणनीति?

बीते 15 अगस्त को जब हम अपनी आजादी की 75वी वर्षगाँठ ‘आजादी का अमृत महोत्सव” मना रहे थे,वहीं अफगानिस्तान की राजधानी में जो कुछ घटित हुआ वह 21वीं सदी में लोकतांत्रिक मूल्यों पर कुठाराघात के समान और सबसे शर्मनाक घटना के तौर पर इतिहास के पन्नों में दर्ज होगी। घोर कट्टरपंथी तालिबान ने बिना किसी चुनौती के काबुल पर दिन दहाड़े कब्जा जमा लिया,फिर जो कुछ हुआ वह किसी से छिपा नहीं है,ट्विटर के युग में सारी जानकारी फौरन आम जनमानस तक तेजी से मुहैया होती रही है।भारत के सामरिक और रणनीतिक संप्रभुता बरकरार रहने और भारतीय राजनयिक और कूटनीति हलकों में अफगानिस्तान का बेहद अहम स्थान है। भारत अफगानिस्तान को ‘नेचुरल अलॉय' के रूप में देखता है। भारत अफगानिस्तान के लिए अपने समावेशी षट्कोणीय दृष्टिकोण के तहत अफगानिस्तान को एक “स्वतंत्र, तटस्थ, समग्र, शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और समृद्ध” रूप में देखने के लिए प्रतिबद्ध और आकांक्षी है। भारत ने अफगानिस्तान के सर्वांगीण और समावेशी विकास के लिए रणनीतिक, सामरिक महत्व के अतिरिक्त अन्य कई पहल और कदम भी उठाए हैं।

भारत के लिए गुंजाइश।

वर्तमान में तालिबान के सत्ता में होने के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गयी है। पाकिस्तान,चीन और तालिबान के त्रिकोणात्मक गठजोड़ के बाद अब भारत को अफगानिस्तान में अपने प्रभाव के लिए लंबी कूटनीतिक लड़ाई के लिए तैयारी रहना पड़ेगा। अफगानिस्तान में जिस कदर तेजी से हालात बदल रहे हैं उसकी तुलना हम तालिबान के पिछले शासन 1996 से 2001,(जिसे आप तालिबान1.0 कह सकते हैं),के साथ नहीं कर सकते हैं क्योंकि उस वक्त उत्तरी गठबंधन(नॉदर्न अलाइंस) वजूद में था। उत्तरी गठबंधन अफगानिस्तान के पूरे उत्तरी और पूर्वी हिस्से में अपनी जबरदस्त पकड़ के साथ तालिबान को कड़ी चुनौती देते हुए पूरे सामरिक स्थिति को प्रतिसन्तुलित कर रहा था। इससे भारत के उत्तरी हिस्से, खासकर कश्मीर में किसी तरह की विदेशी/भाड़े के आतंकवादियों के हमले के खतरे से उन्मुक्ति मिली थी,यह बात गौर करने वाली है कि उस दौर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद चरम पर था जिसे भारतीय सुरक्षा बलों ने “भारतीय तरीके” से माकूल जवाब दिया था। लेकिन,इस बार ऐसा नहीं है, तालिबान का पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा है, जो भारत की “रणनीतिक चिंता” को बढ़ाता है। भारत तकनीकी रूप से डूरंड लाइन पर अवस्थित वाखान गलियारे के जरिये अफगानिस्तान की सीमा साझा करता है,और यही आज की सबसे बड़ी चिंता की वजह है।

जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 35ए और 370 की समाप्ति के बाद तिलमिलाये पाकिस्तान को मानो तालिबान के शासन के बाद मुंह मांगी मुराद मिल गयी और वह इसका फायदा उठाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ने की मंशा से पूरे कश्मीर के हालात बिगाड़ने की पूरी कोशिश करेगा। तालिबान 1.0 में पाकिस्तान की इस क्षेत्र में एक नहीं चली थी क्योंकि उत्तरी गठबंधन भारत के साथ था, पर ..आज स्थिति पूरी तरह उलट है। पाकिस्तान की अवैध संतान के रूप में तालिबान,कश्मीर में अशांति फैलाने की मंशा लिए पाकिस्तान का साथ देकर अपने पितृ ऋण से इस बार अवश्य ही उऋण होना चाहेगा ।

पाकिस्तान में पले बढ़े तालिबान के साथ भारत की सुरक्षा संबंधी जायज़ चिंता बरकरार है क्योंकि तालिबान लश्कर ए तैयबा, हरकत -उल -मुजाहिदीन, हरकत- उल- -जिहाद-अल -इस्लामी को अपना व्यापक समर्थन देता है,ये आतंकवादी संगठन भारत मे आतंकी गतिविधियों को सक्रिय रूप से अंजाम देते आ रहे हैं। तालिबान के सत्ता में आने के बाद रावलपिंडी,कंधार और काबुल के बीच इन आतंकियों को फिर से नए स्तर पर कश्मीर जिहाद के लिए उकसाना और दिमाग की वर्जिश करनी होगी। मौजूदा दौर में भारत के लाख न चाहने के बाद भी अफगानिस्तान इन आतंकवादियों के लिए सबसे सुरक्षित पनाहगाह बन गया है,डूरंड लाइन की बाध्यता समाप्त हो चुकी है और अफगानिस्तान पर पाकिस्तान की “स्ट्रेटेजिक डेप्थ”अत्यधिक मज़बूत हुई है जो भारत के लिए अत्यधिक चिंता की बात है। भारतीय सुरक्षा बलों के लिए आने वाले समय में यह बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थिति होगी। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय सुरक्षा बल आतंकवाद निरोधी कार्रवाई के महारथी हैं।

भारतीय सुरक्षा बलों ने 1990 के दशक में कश्मीर में व्यापक रूप से सक्रिय पाकिस्तान प्रायोजित भाड़े के आतंकवादियों जो सूडान से चेचेन्या और दागेस्तान से अफगान मूल के खूंखार आतंकी थे उनको सफलतापूर्वक मार गिरा कर घाटी को इनके आतंक से बचाया था। इन्हें लंबे समय से आतंकवाद के विभिन्न स्वरूपों के साथ कार्रवाई का व्यापक पेशेवर अनुभव है,अपनी दक्षतापूर्ण कार्रवाई से वे इन कट्टरपंथी आतंकवादियों को लंबे समय से उनके बहत्तर हूरों के पास पूरी संजीदगी के साथ भेजते आएं है। और, हर बार की तरह इस बार भी अगर इन आतंकियों ने कश्मीर की आवो हवा बिगाड़ने की कोशिश की तो सुरक्षा बल उन्हें इस बार भी उनके जहन्नुम में इंतजार कर रही उनके हूरों के पास भेजेंगे। पाकिस्तान ,अफगानिस्तान में भारत विरोधी समूहों को चाक चौबंद करने में जुट गया है, जिसमे सबसे प्रमुख लोया पकतिया क्षेत्र में मौजूद भारत विरोधी संगठन हैं। भारत को यहां यह बात अच्छे से समझनी होगी कि अफ़ग़ानिस्तान का खेल समाप्त नहीं हुआ बस एक दौर बीता है और यहां इस क्षेत्र की बिसात पर एक नया ‘ग्रेट गेम’ शुरू हो रहा है। इसमे रूस,चीन,ईरान,पाकिस्तान के साथ भारत को अफगानिस्तान में अपनी चाल बेहद सावधानी के साथ चलनी होगी। चीन पाकिस्तान की ‘सदाबहार दोस्ती’और भारत के साथ उनका ‘सामरिक,रणनीतिक वैर’ किसी से छुपा नहीं है,इसलिए वर्तमान विषम राजनयिक,रणनीतिक और संभारिकी की परिस्थितियों में भारत को “सामरिक सब्र’ दिखाने की अत्यधिक आवश्यकता है। 

आर्थिक पक्ष : भारत ने अफगानिस्तान में व्यापक पैमाने पर निवेश किया है, जो अफगानिस्तान के सामरिक,आर्थिक,आधारभूत अवसंरचना और क्षमता निर्माण से सम्बंधित है। अफगानिस्तान प्रचुर खनिज संपदा से सम्पन्न देश है जिसमे लौह अयस्क,अत्यधिक हल्की और भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली लिथियम,क्रोमियम, प्राकृतिक और पेट्रोलियम गैस के साथ साथ बहुमूल्य अकार्बनिक पदार्थ जिसमें बेशकीमती पत्थर शामिल हैं,वर्तमान में इन सभी पर तालिबान का कब्जा है। चीन की टेढ़ी नजर इसके हाजिगक क्षेत्र में अवस्थित प्रचुर लौह अयस्क के क्षेत्र पर लंबे समय से जमी है। यह क्षेत्र काबुल से 130 किलोमीटर पश्चिम में बामियान प्रान्त में अवस्थित है। 1960 के सोवियत -अफगान संयुक्त खनिज आयोग के आंकड़ों के अनुसार इस क्षेत्र में करीब 1.8 बिलियन टन लौह अयस्क (जिसमे 62फीसद लौह है) होने की सम्भावना है। तालिबान के सत्ता में आने के बाद यहां सम्भवतः सबसे बड़े खनिज की खोजबीन और भारी मात्रा में उत्खनन देखने को मिले,और यह मौका किस देश को मिलेगा ,यह बताने का कोई औचित्य नहीं।

भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की भारतीय इस्पात प्राधिकरण लिमिटेड (SAIL) की अगुवाई में लाखों डॉलर वाली परियोजना जिसमे राष्ट्रीय खनिज विकास निगम,राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड, जे एस डब्लू स्टील,जेएसडब्लू इस्पात और मोनेट इस्पात शामिल है। इस क्षेत्र के चार ब्लॉकों के ये तकनीकी बिड की निविदाएं दी थी जिसे तकनीकी आर्थिक संभाव्यता और अफगान सरकार से मंजूरी मिलनी बाकी थी। यह परियोजना भी तालिबान के सत्ताशीन होने के बाद अधर में दिखाई दे रही है। 

भारत मे बढ़ेगा नार्को टेररिज्म का भय:

तालिबान के शासन में भारत को नार्को टेररिज्म से खासा सावधान रहने की दरकार है। पूरा पंजाब आएसआई के नशे की आतंकवाद का शिकार बना बैठा है । अब अफीम और अन्य मादक पदार्थो के ज़बरदस्त व भरपूर पैदावार के लिए मशहूर अफगानिस्तान उस “स्वर्णिम चंद्र”(गोल्डन क्रेसेन्ट) का भाग बनेगा जिसमे पाकिस्तान और ईरान पहले से शामिल है। अफगानिस्तान में अशरफ गनी की सरकार में इस मार्ग पर व्यापक रोकथाम लगाई गयी थी लेकिन फिलहाल मौजूदा परिस्थितियों में यह क्षेत्र बेरोकटोक का हो गया है । भारत के युवा पीढ़ी को नशे की गिरफ्त में लाकर उन्हें खोखला करने की मंशा लिए पाकिस्तान के लिए नार्को टेररिज्म ,सबसे पसन्दीदा हथियार रहा है।

पाकिस्तान का महत्व: मौजूदा हालात में अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान का संभवतः सब कुछ दांव पर लगा हुआ है और यह सब इस बात पूरी तरह निर्भर करेगा कि तालिबान किस तरह अपनी हुकूमत चलाता है।

ज़ाहिर है रावलपिंडी और इस्लामाबाद, काबुल में अपने लिए एक अहम भूमिका को देखते हैं,और भौगोलिक रूप से यह भूमिका पाकिस्तान को नैसर्गिक रूप से मिलती भी है क्योंकि — 

★पाकिस्तान ने न सिर्फ तालिबान का समर्थन किया बल्कि अमेरिकी बी 52 बम बर्षक के "कारपेट बॉम्बिंग" और कहर बरपाते "डेजी कटर" बमबारी के दौरान उन्हें उनके बुरे दौर में सुरक्षित ठिकाने और छिपने के अड्डे भी मुहैया कराए।

★पाकिस्तान ने तालिबान को दोबारा अपनी ताक़त को हासिल करने में हथियारों और मौद्रिक रूप से मदद की।

◆ पाकिस्तान यहीं नहीं रुका उसने तालिबान को उनकी योजनाएं और रणनीति बनाने में भी मदद की है और अन्य जरूरी कदम उठाते हुए तालिबान आंदोलन को टूटने से भी बचाया है।

★ज़ाहिर है कि पाकिस्तान को ये महसूस हो रहा होगा कि अफ़ग़ानिस्तान में उसकी कितनी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी ?? वहीं अमेरिका के दबाव के बीच पाकिस्तान ने अमेरिकी हमलों के दौरान कुछ ऐसे कुकृत्य भी किये जिससे तालिबान के नेता आज भी अपने साथ  हुए पूर्व बर्ताव और पाकिस्तान के असहज रवैये के चलते पाकिस्तान के प्रति गहरी नाराज़गी भी रखते हैं।

★विश्लेषकों का एक धड़े का ऐसा भी मानना है कि कहीं तालिबान अड़ियल रवैया न अख़्तियार कर लें,और पाकिस्तान की बात मानने से से इनकार कर दें और हो सकता है कि वे "पाकिस्तानी तालिबान" का समर्थन भी करने लगें।

अगर ऐसा होता है तो भारत के लिए बेहद सुनहरा मौका होगा और जल्द ही काबुल में भारत को भी अपने दांव चलने का मौक़ा मिलेगा।

अब गेंद पूरी तरह तालिबान के पाले में है, अमेरिका साइगॉन सिंड्रोम से ग्रस्त होकर अफगानिस्तान से अपना पल्ला पूरी तरह झाड़ चुका है।रूस,चीन को तालिबान से कोई बैर नहीं, पाकिस्तान दोनो महाशक्तियों के साथ मिलकर उनकी हां में हां मिलाने से बाज़ नहीं आ रहा है। सऊदी अरब पहले भी तालिबान के साथ था,अब भी उसे इस संगठन से कोई गुरेज़ नहीं है।’आर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कन्ट्री’ के सदस्य देश अंधे -गूंगे -बहरे की तरह स्वांग कर रहे हैं ,सुरक्षा परिषद में रूस और चीन अमेरिकी विफलता पर मन्द मन्द मुस्कुरा रहे हैं,बिडेन खुद की अफ़ग़ान नीति पर लंगर डाल आलोचनाओं के मझदार में अकेले खड़े हैं और “घर फूंक नीति” (Doctrine of scorching earth Policy) के जनक ब्रिटेन अमेरिकी मूर्खता पर अपने लंबे बेतरतीब बिखरे बालों को नोच रहा है ,मानो वे कह रहें हो कि कम से हमने तो यह नहीं सिखाया। वहीं,शिया बहुल ईरान पूरी सशंकित,सतर्क और चौकस है क्योंकि उसे 1998 में अपने 11 राजनयिकों की हत्या को वह आज तक नहीं भूले हैं,सीमा विवाद और हेलमंड नदी का विवाद आज भी अफगानिस्तान के साथ बरकरार है, जिसके सुलझने की संभावना बेहद क्षीण है,सुन्नी कट्टरपंथी तालिबान भी देश में अल्पसंख्यक शियाओं को पूर्व में अपना निशाना बनाते आये हैं। 

आखिर क्या करे भारत:

★भारत की सबसे बड़ी मजबूरी/चुनौती होगी कि वह “तालिबान”से वार्ता करे या न करे ?

★भारत को ईरान के मकरान तट पर अवस्थित चाबाहार बंदरगाह सहित अनेक रणनीतिक महत्व की परियोजना,जो पूरे क्षेत्र की भू सामरिक परिस्थितियों पर अपना अहम भूमिका निभाती है, उस पर ईरान के साथ बेहद संजीदगी से मंथन करना होगा।

★हालांकि, तालिबान ने बीते मंगलवार को अपने पहले पत्रकार सम्मेलन में स्पष्ट किया कि मौजूदा तालिबान मध्ययुग के शैतान नहीं, बल्कि वे रूढ़िवादी हैं,प्रवक्ता ने कहा कि वे महिलाओं के अधिकारों को नहीं छीनेंगे, लेकिन उन्हें शरिया कानून के तहत ही स्वतंत्रता मिलेगी। अगर ऐसा भी होता है तो भारत को भी उनके प्रति नरमी अख़्तियार करने के लिए सोचना पड़ेगा।

यह भी संभव है कि पाकिस्तान को प्रतिसन्तुलित करने के लिए तालिबान ही भारत की ओर मैत्री का हाथ बढ़ाएं,क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई भी स्थायी मित्र व शत्रु नहीं होता,इसमें सब कुछ जायज है क्योंकि राष्ट्र हित ही सर्वोपरि है। क्लासिकल कूटनीति को ध्यान रखें तो,आज भारत उस स्थिति में है कि वह अफगानिस्तान के विभिन्न मोर्चों पर एक लंबी लड़ाई के लिए तैयार रहे।इसमें पाकिस्तान द्वारा अफ़ग़ानिस्तान में भारत विरोधी गतिविधियों को प्रतिसन्तुलित करते हुए वहां मौजूद अपने मित्रों की “बहुआयामी मदद “करना/देना चाहिए। 

जरूरत पड़ी तो 'अपने दोस्तों' को शरण देने मे संकोच नहीं करना चाहिये,क्योंकि जब कभी अफ़ग़ानिस्तान में हालात बदले तो वो हमारे सबसे भरोसेमंद साथी या यूं कहें तो वे हमारे ‘डीप एसेट’ होंगे क्योंकि बचपन में हमने “काबुलीवाला” की कहानी पढ़ी है,वे जुबान के पक्के होते हैं,और मौजूदा दौर में अफ़ग़ान दोस्तों की मदद करना सिर्फ़ जज़्बाती प्रतिक्रिया नहीं बल्कि यह एक सामरिक कदम सिद्ध होगा। मौजूदा अफगानिस्तान के हालात पर भारत को सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी के साथ-साथ अपने हितों की रक्षा और क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा और अगर जरूरत पड़ी तो कठोर राजनयिक और कूटनीतिक विकल्प सहित अन्य तमाम प्रभावी रास्तों को तलाशने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखानी चाहिए।